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वर्साय की संधि: गुण और दोष Treaty of Versailles in Hindi

वर्साय की संधि
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वर्साय की संधि: गुण और दोष Treaty of Versailles in Hindi

वर्साय की संधि: गुण और दोष Treaty of Versailles in Hindi-Hello Friends, wikimeinpedia.com पर आपका स्वागत है, आज हम वर्साय की संधि: गुण और दोष Treaty of Versailles in Hindi के बारे में चर्चा करेंगे.  वार्साय की संधि को इतिहास में “एक लादी गई शांति” अर्थात् “आरोपित संधि” के नाम से भी जाना जाता है। वर्साय की संधि कठोर, अपमानजनक, आरोपित, एकपक्षीय तथा अन्याय पूर्ण थी| 

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वर्साय की संधि:

द्वितीय विश्वयुद्ध की संभावना 1919 ई॰ के शान्ति सम्मेलन के समय से ही हो गयी थी । जर्मनी के साथ विजयी राष्ट्रों ने वर्साय की अपमानजनक संधि की थी । इसी संधि में द्वितीय विश्वयुद्ध के कीटाणु विद्यमान थे । इस संधि द्वारा जर्मनी के साथ घोर अन्याय हुआ था । उसे बलपूर्वक धमकी देकर संधिपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया था ।

जर्मनी से एल्सास-लोरेन के प्रांत तथा श्लेसविग का लघु राज्य छीन लिया गया, पोलैण्ड के लिए गलियारा निर्मित करके उसका अंग-भंग किया गया, उसे अपने सभी उपनिवेशों से हाथ धोना पड़ा, सार प्रदेश की खानों से वह पंद्रह वर्षों के लिए वंचित कर दिया गया और इस तरह से कई अन्य प्रादेशिक क्षति पहुँचायी गयी ।

जर्मनी को आर्थिक साधनों से वंचित कर उस पर क्षतिपूर्ति की एक भारी रकम लाद दी गयी और बड़ी बेरहमी के साथ इसे वसूलने का प्रयास किया गया । इसके लिए फ्रांस ने तो जर्मनी के रूर प्रदेश पर अधिकार भी कर लिया और वहाँ के जर्मन निवासियों पर घोर अत्याचार किये गये ।

यद्यपि जर्मनी घोर आर्थिक संकट से घिरा हुआ था, फिर भी क्षतिपूर्ति के मामले में उस पर कोई रहम नहीं किया गया । वर्साय संधि के द्वारा जर्मनी को पूर्णत: निरस्त्र कर दिया गया था । यद्यपि मित्रराष्ट्रों ने जर्मनी को आश्वासन दिया था कि वे भी अपने आयुधों के भण्डार में कमी करेंगे, परन्तु इस ओर उन्होंने कभी कोई कदम नहीं उठाया ।

हर तरह से जर्मनी को अपमानित करने का प्रयास किया गया । इस हालत में जर्मनी से यह आशा करना कि वह चुप होकर इन अपमानों को सहता रहेगा और इसके प्रतिकार के लिए कुछ भी नहीं करेगा, एक दुराशामात्र ही थी । मित्रराष्ट्र भी इस तथ्य को भली-भाँति समझते थे कि जर्मनी को जैसे ही पहला अवसर मिलेगा, वह इस कलंक को धोने का प्रयास करेगा और इसी कम में एक दूसरा युद्ध भी छिड़ेगा । इसीलिए, फ्रांस के सुप्रसिद्ध सेनापति मार्शल फॉच ने 1919 ई॰ में ही कहा था- ”वर्साय की संधि शान्ति की संधि नहीं, वरन् केवल बीस वर्षों के लिए युद्धविराम संधि मात्र है ।”

युद्ध में पराजय के बाद जर्मनी में प्रजातंत्र की स्थापना हुई और वाइमर संविधान का निर्माण हुआ । वाइमर गणराज्य की जड़ें अभी जमी भी न थीं कि उसके सामने अनेकानेक जटिल समस्याएँ उपस्थित हो गयीं । इन सारी समस्याओं के मूल में वर्साय संधि द्वारा स्थापित व्यवस्था थी । यूरोप के राज्यों ने प्रजातान्त्रिक जर्मनी से कभी सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार नहीं किया और न उसे कोई मदद दी, ताकि वहाँ की जनता में शान्तिप्रियता की भावना पनपे ।

इसके विपरीत, जर्मनी की विवशता से लाभ उठाकर उन्होंने उसे परेशान करना शुरू किया, जिससे जर्मनी में असाधारण परिस्थितियाँ पैदा हुईं-वैसी परिस्थितियाँ जिनका मुकाबला करने में वाइमर गणराज्य बिल्कुल असफल रहा और जर्मन लोगों की निगाह में वह बिल्कुल गिर गया ।

वाइमर गणराज्य का नाम अपमान, कलंक, संकट, दुर्दशा के साथ जुड़ गया और जर्मन लोगों में इसके प्रति कोई सहानुभूति नहीं रही इस प्रकार, जर्मनी में गणतंत्र का आधार निर्बल बना रहा । इससे सबसे अधिक लाभ जर्मनी की नात्सी पार्टी ने उठाया । इस दल का नेता हिटलर था, जिसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसका सर्वप्रमुख उद्देश्य वर्साय संधि को तोड़कर जर्मनी के अपमान का प्रतिकार लेना था ।

उसने जर्मनी की सभी तकलीफो के लिए वर्साय संधि को दोषी बताया और जर्मन जनता से वादा किया कि यदि वह सता में आयेगा तो उसका पहला कार्य इसी कलंक को धोना होगा । इस कार्यक्रम से जर्मनी की जनता उसकी ओर आकर्षित होने लगी और उसके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी ।

1929-30 की आर्थिक मंदी के कारण हिटलर के अनुयायियों की संख्या और बड़ी और चुनाव में भारी बहुमत प्राप्त करके हिटलर जर्मनी का चांसलर बन बैठा 1934 ई॰ में राष्ट्रपति हिण्डेनबर्ग के मरने के बाद चांसलर और राष्ट्रपति के पदों को मिलाकर वह स्वयं जर्मनी का अधिनायक बन बैठा ।

इसके बाद हिटलर ने घोर आक्रामक नीति का अवलंबन कर संसार को भयंकर विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया तुष्टीकरण की नीति-सता अधिग्रहण करते ही हिटलर ने उग्र विदेश-नीति का सहारा लिया और वर्साय संधि की शर्तों को तोड़ना शुरू किया । उसने बड़े पैमाने पर आयुधों का निर्माण शुरू किया तथा जर्मनी में सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी ।

यह वर्साय की संधि का खुला उल्लंघन था, लेकिन किसी महाशक्ति ने (यहाँ तक कि फ्रांस ने भी) इसका कोई कारगर विरोध नहीं किया । देखते-देखते सैनिक दृष्टि से जर्मनी एक महान शक्ति बन गया । वर्साय संधि के द्वारा राइनलैण्ड का असैनिकीकरण कर दिया गया था ।

लेकिन, हिटलर ने इसकी कोई परवाह नहीं की और 1935 ई॰ में फौज भेजकर इस इलाके पर अधिकार करके वहाँ किलेबंदी शुरू कर दी । इस अवसर पर भी ब्रिटेन और फ्रांस उसका कोई विरोध नहीं कर सके और हिटलर को मनमानी करने की छूट दे दी गयी । इससे हिटलर का हौसला बढ़ता गया और मार्च, 1938 में उसने स्वतंत्र राज्य के रूप में आस्ट्रिया का अस्तित्व समाप्त करके उसे जर्मन साम्राज्य में मिला लिया ।

इस अवसर पर भी विरोध का कोई स्वर कहीं से सुनायी नहीं पड़ा अत: निर्भीक होकर हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया के सुडटेन इलाके का प्रश्न उठाया । सुडटेनलैण्ड की अधिकांश आबादी जर्मन थी और, हिटलर ने धुँआधार प्रचार करना शुरू किया कि सुडटेन जर्मनों के साथ चेकोस्लोवाकिया की सरकार बड़ी बेरहमी का बर्ताव करती है । उसने माँग की कि पूरे सुडटेन इलाके को जर्मनी के हवाले कर दिया जाय अन्यथा जर्मनी चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण करके इस भू-भाग पर अधिकार कर लेगा ।

इस प्रश्न पर समझोते के कई प्रयास हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला और ऐसा प्रतीत हुआ कि सुडटेन-समस्या को लेकर यूरोप के बड़े राष्ट्रों के बीच युद्ध छिड़ जायेगा । लोकन, ब्रिटेन और फ्रांस युद्ध से कतराते थे और बातचीत से समस्या सुलझाना चाहते थे । उन्होंने चेकोस्लोवाकिया का बलिदान करके युद्ध के विस्फोट को रोकने का प्रयास किया । इसी पृष्ठभूमि में म्यूनिख का सम्मेलन और समझौता हुआ और हिटलर जो चाहता था, वह उसको प्राप्त हो गया ।

अन्य फासिस्ट शक्तियों की आक्रामक कार्यवाही रोकने का भी कोई प्रयास नहीं हुआ । 1931 ई॰ में जापान ने चीन पर आक्रमण करके मंचूरिया के प्रदेश पर अधिकार कर लिया । राष्ट्रसंघ में इसकी शिकायत पहुँची, लोकन उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गयी ।

एक मुजरिम को छोड़ देने से दूसरे मुजरिम को स्वाभाविक रूप से प्रोत्साहन मिलता है । अंतरराष्ट्रीय-पैमाने पर यही हुआ, जब मुसोलिनी ने अबीसीनिया पर आक्रमण कर दिया अबीसीनिया ने भी चीन की तरह ही राष्ट्रसंघ में अपील की, लेकिन उसकी शिकायत पर भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी ।

इस तरह छोटे और कमजोर राष्ट्र पिटते रहे तथा सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त का हनन होता रहा । इसमें राष्ट्रसंघ का कोई दोष नहीं था । दोष तो उन राष्ट्रों, विशेषकर ब्रिटेन और फ्रांस का था, जिन्होंने राष्ट्रसंघ को जान-बूझकर कमजोर बनाने की नीति अपनायी और सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त का मजाक उड़ाते रहे यदि ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन राष्ट्रसंघ को मिलता तो अंतरराष्ट्रीय अराजकता का यह वातावरण तैयार नहीं होता ।

ब्रिटेन और फ्रांस ने ऐसी नीति का अवलंबन क्यों किया ? ब्रिटेन और फ्रांस ने जिस नीति का अवलंबन किया उसे अब तुष्टीकरण की नीति कहा जाता हे । इसतुष्टीकरण नीति का आधार यह विश्वास था कि यदि हिटलर और मुसोलिनी की कुछ शिकायतें दूर कर दी जायें तो वे संतुष्ट हो जायेंगे और सभी समस्याओं का शान्तिपूर्ण हल निकल आयेगा ।

लेकिन, उनकी यह महान भूल थी । उनकी सबसे बड़ी भूल इस विश्वास का भ्रान्तिपूर्ण होना था कि हिटलर और मुसोलिनी की तृष्णा और अभिलाषाओं को शान्त भी किया जा सकता हे । ब्रिटेन और फ्रांस के नीति-निर्धारक, वास्तव में सोवियत साम्यवाद के खिलाफ हिटलर और मुसोलिनी के आक्रामक इरादों को मोड़ना चाहते थे ।

वे साम्यवादी सोवियत संघ से आतंकित थे और चाहते थे कि साम्यवाद और फासिस्टवाद एक-दूसरे से जूझ जायें और आपस में लड़कर एक-दूसरे को बरबाद करें । तुष्टीकरण की नीति के मूल में मुख्यत: पश्चिमी राष्ट्रों की सोवियत- विरोधी भावना ही काम कर रही थी । लेकिन, 1939 ई॰ में पश्चिमी राष्ट्रों का छहपूरा नहीं हुआ ।

अधिनायकों का गुस्सा उस समय सोवियत संघ पर नहीं, वरन् पश्चिम समर्थित राष्ट्रों पर उतरा, जब हिटलर ने पोलैण्ड के खिलाफ सैनिक कार्यवाही करके द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ किया ।

वर्साय संधि की प्रमुख धाराएं

प्रथम विश्व युद्ध में पराजित होने के पश्चात जर्मनी ने 28 जून 1919 के दिन वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर किये| यह संधि 230 पृष्ठों में अंकित थी और इस संधि पत्र में 15 भाग और 440 धाराएं थी| वर्साय संधि की प्रमुख धाराएं निम्नलिखित थी-
1- एल्सस-लॉरेन,मार्स नेट, यूक्रेन, माल्मेडी, अपर साइलेसिअा, मैमल, पोसन आदि प्रदेश जर्मनी से छीन कर फ्रांस, बेल्जियम, लिथुआनिया तथा पोलैंड को दे दिए गए| संधि की शर्तों के अनुसार एल्सस-लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस दे दिये गये।
2- जर्मनी के राइनलैंड का निरस्त्रीकरण कर दिया गया तथा सार घाटी पर फ्रांस का नियंत्रण स्थापित हो गया|
3- जर्मनी में सार क्षेत्र कोयला उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रदेश की शासन व्यवस्था की जिम्मेदारी राष्ट्रसंघ को सौंप दी गई, परन्तु कोयले की खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया था|
3- जर्मनी के अफ्रीका तथा एशिया स्थित सभी उपनिवेशों को मैंडेट व्यवस्था के अंतर्गत मित्र राष्ट्रों ने आपस में बांट लिया|
4- जर्मनी कि स्थल सेना की सीमा एक लाख निश्चित कर दी गई तथा जर्मनी की अनिवार्य सैनिक सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
5- जर्मनी की नौसेना पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया गया| अब वह 10000 टन के 6 हल्के युद्धपोत,6 हल्की क्रूजर [ मालवाही जहाज] तथा 12 विध्वंसक जहाज ही रख सकता था| उनकी पनडुब्बियां भी छीन ली गई इन पनडुब्बियों को मित्र राष्ट्रों को सौंपने की बात की गई| इसके साथ ही साथ जर्मन सेना के स्टाफ को भंग कर दिया गया|
6- जर्मनी को सबसे अधिक नुकसान पूर्वी सीमा पर उठाना पड़ा। जर्मनी के डेजिंग बंदरगाह पर लीकऑफ नेशन का नियंत्रण स्थापित हो गया||
7- जर्मनी की नदियां तथा नील नहर का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर दिया गया|
8- जर्मनी पर युद्ध का भारी हर्जाना थोपा गया और उसे मई, 1921 ईस्वी तक 5 अरब डालर की धन राशि क्षतिपूर्ति के रूप में देने को कहा गया|
9- मोरक्को, मिस्र, बुलगारिया, चीन आदि से प्रात जर्मनी के व्यापारिक अधिकारों को भी समाप्त कर दिया गया|
10- संधि की 231वीं धारा के अनुसार जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध के लिए के लिए उत्तरदाई ठहराया गया तथा सम्राट कैसर विलियम द्वितीय को युद्ध अपराधी मानकर उस पर मुकदमा चलाने का निश्चय किया गया|

वर्साय की संधि का महत्व-

Importance of Treaty of Versailles in Hindi- वार्साय की संधि को इतिहास में “एक लादी गई शांति” अर्थात् “आरोपित संधि” के नाम से भी जाना जाता है। वर्साय की संधि कठोर, अपमानजनक, आरोपित, एकपक्षीय तथा अन्याय पूर्ण थी| इस संधि द्वारा जर्मनी को राजनीतिक दृष्टि से अस्थिर, सैनिक दृष्टि से दुर्बल, सामाजिक दृष्टि से अपमानित तथा आर्थिक दृष्टि से पंगु बना दिया गया था| वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपा गया था, इसी कारण से इस संधि को एडोल्फ हिटलर और अन्य जर्मन लोग इसे अपमानजनक मानते थे| यह सन्धि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों में से एक थी। इस संधि से जर्मनी को छिन्न-भिन्न कर दिया गया| इस संधि ने उन लोगों की आशाओं पर पानी फेर दिया था जो यह कहा करते थे कि युद्ध का अंत शांति का संदेश लाएगा| यह सही अर्थों में शांति संधि नहीं थी, यह तो दूसरे विश्व युद्ध की घोषणा सिद्ध हुई|
जनरल फाच ने तो संधि- पत्र के निर्माण के समय ही कह दिया था कि- वर्साय की संधि, संधि न होकर 20 वर्षों का एक विराम काल है|,
चर्चिल के अनुसार “इस संधि की आर्थिक शर्तें इस हद तक कलंकपूर्ण तथा निर्बुद्ध थी कि उन्होंने ने इसे स्पष्टतया निरर्थक बना दिया।
विश्व इतिहास के जिन संधियों और उनके प्रभावों की सर्वाधिक चर्चा हुई है, उनमें वर्साय की संधि का विशिष्ट स्थान है। संक्षेप में कहा जाता है कि वर्साय की संधि मित्र राष्ट्र द्वारा बदले की भावना से जर्मनी पर थोपी गई थी| इसलिए ऐसा माना जाता है कि वर्साय की संधि में दूसरे महायुद्ध के कीटाणु निहित थे|

वर्साय की संधि के दोष 

वर्साय की संधि के प्रावधान कठोर थे। मूल रूप से यह अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन के चौदह अंकों के आदर्शवाद पर आधारित था, लेकिन वास्तव में यह जर्मनी को अपंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। संधि के 440 लेखों की प्रमुख शर्तें जर्मनी की शक्ति को नष्ट करने के उद्देश्य से थीं। सुदूर क्षेत्रीय परिवर्तन इस संधि से प्रभावित हुए थे। फ्रांस को अलसाक और लोरेन वापस मिल गया था। बेल्जियम को यूरोप मैलेमी और मोरसेट मिला था, पोलैंड को ऊपरी सिलेसियन और पूर्वी प्रशिया का दक्षिणी हिस्सा मिला था।

डैज़िंग को एक स्वतंत्र शहर बना दिया गया था। सार घाटी को एक अंतरराष्ट्रीय आयोग के नियंत्रण में रखा गया था और फ्रांस को घाटी की कोयला खानों के दोहन का अधिकार दिया गया था। 1924 में मेमोरियल लिथुआनिया को दिया गया था। ऑस्ट्रिया और जर्मनी के संघ को मना किया गया था। जर्मनी को उसकी सभी विदेशी संपत्ति और उपनिवेशों को त्यागने के लिए बनाया गया था, जिन्हें बाद में विजयी शक्तियों के तहत जनादेश के रूप में रखा गया था। संक्षेप में, जर्मनी अपने क्षेत्र के लगभग एक लाख वर्ग मील से वंचित था। इस संधि ने जर्मनी की सैन्य ताकत को काफी कम कर दिया था।

संधि की आर्थिक धाराओं को युद्ध के नुकसान और नुकसान के लिए जर्मनी को भुगतान करने के लिए निर्देशित किया गया था। संधि में, जर्मनी ने अपनी कृषि योग्य भूमि का लगभग 15% और अपने औद्योगिक क्षेत्र का 12% खो दिया। इन सबसे ऊपर, यह पुनर्भुगतान भुगतानों पर बोझ था जो इसकी क्षमता से परे थे। यहां तक ​​कि राजनीतिक रूप से जर्मनी को वेइमर गणराज्य संविधान को स्वीकार करने के लिए बनाया गया था।

यह जर्मनी को पश्चिमी राजनीतिक संस्थानों और प्रथाओं को स्वीकार करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जो हालांकि, इस राज्य के लोगों के पिछले राजनीतिक अनुभव और मूल्यों के अनुरूप नहीं थे। यह वास्तव में एक तयशुदा संविधान था जिसे आने वाले वर्षों में दफन होना तय था। इस प्रकार, वर्साय की संधि में भविष्य के युद्ध के रोगाणु थे। अंतर-युद्ध की अवधि के घटनाक्रम ने इन कीटाणुओं को दुनिया को बढ़ने और दूसरे वैश्विक युद्ध की ओर ले जाने में मदद की, पहले एक के अंत के 20 साल बाद।

1. वर्साय की संधि किसके साथ हुई?
उत्तर :-  जर्मनी 
 
2.  प्रथम विश्व युद्ध में कितने राष्ट्रों ने भाग लिया?
उत्तर :-  37 ने
 
3.  गुप्त संधियों की प्रणाली का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर :- बिस्मार्क को 
 
4.  ऑस्ट्रिया, जर्मनी एवं इटली के मध्य त्रिगुट का निर्माण कब हुआ?
उत्तर :- 1882 में 
 
5.  रूस-जापान का युद्ध कब हुआ?
उत्तर  1904 –
1905 में
 
6.  प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने किस राष्ट्र पर 1914 ई. में आक्रमण किया?
उत्तर :-  बेल्जियम, लक्जमबर्ग, फ्रांस व रूस पर 
 
7.  अमेरिका किस समय प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ?
उत्तर :-  6 अप्रैल, 1917 को 
 
8.  पेरिस शांति सम्मेलन कब से कब तक आयोजित हुआ?
उत्तर :-  18 जनवरी, 1919 
से
21 जनवरी, 1920 तक 
 
9.  लीग ऑफ नेशंस की स्थापना कब हुई?
उत्तर :-  1920 ई. में
 
10.  द्वितीय विश्व युद्ध कब शुरू हुआ?
उत्तर :- 1 सितंबर, 1939 ई.  में
 
11.  द्वितीय विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर :-  2 सितंबर, 1945 ई. में
 
12.  द्वितीय विश्व युद्ध का तत्कालीन कारण क्या था?
उत्तर :- जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण 
 
13.  म्यूनिख पैक्ट कब हुआ?
उत्तर :-  29 सितम्बर, 1938 ई. में
 
14.  जर्मनी द्वारा वर्साय की संधि का पहला बड़ा उल्लंघन कब किया गया?
उत्तर :-  1935 ई. में
 
15.  वर्साय की संधि को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :- आरोपित संधि 
 
16.  अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध में कब भाग लिया?
उत्तर :- 8 दिसंबर, 1941 ई. में
 
17.  जापान के किन दो नगरों पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराये?
उत्तर :- हिरोशिमा व नागासाकी 
 
18.  अमेरिका द्वारा प्रथम परमाणु बम कब गिराया गया?
उत्तर :-  6 अगस्त, 1945 ई. में
 
19.  अमेरिका ने पहला परमाणु बम कहाँ गिराया?
उत्तर :- हिरोशिमा 
 
20.  अमेरिका द्वारा नागासाकी पर परमाणु बम कब गिरया गया?
उत्तर :-  9 अगस्त, 1945 ई. में
 
21.  संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना किस समय हुई?
उत्तर :- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 
 
22.  द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड का प्रधानमंत्री कौन था?
उत्तर :-  विंस्टन चर्चिल 
 
23.  द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका का राष्ट्रपति कौन था?
उत्तर :- फ्रैंकलीन डी. रुजवेल्ट 
 
24.  द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय का श्रेय किसे दिया जाता?
उत्तर :- रूस को 
 
25.  जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कब किया?
उत्तर :- 1931 में 
 
26.  इंग्लैंड में शानदार अलगाववउद की नीति का विचारक कौन था?
उत्तर :- सेलिसेवरी 
 
27.  ‘न्यू डील’ के प्रतिपादक कौन थे?
उत्तर :- फ्रैंकलीन डी. रुजवेल्ट 
 
28.  रोम-बर्लिन समझौता कब हुआ?
उत्तर :- 25 अक्टूबर, 1936 में 
 
29.  जर्मनी ने आत्मसमर्पण कब किया?
उत्तर :- 7 मई, 1945 में 
 
30.  द्वितीय विश्व युद्ध के समय इटली का अधिनायक कौन था?
उत्तर :- मुसोलिनी 
 
31.  अमेरिका का द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल होने का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर :- जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर आक्रमण 
 
32.  ‘यूरोप का मरीज’ किसे कहा जाता है?
उत्तर :-  तुर्की 
 
33.  ‘पान इस्लामिज्म’ का नारा किसने दिया?
उत्तर :- अब्दुल हमीद द्वितीय ने 
 
34.  आधुनिक तुर्की का निर्माता किसे माना जाता है?
उत्तर :-  मुस्तफा कमाल अतातुर्क पाशा 
 
35.  तुर्की में ग्रिगोरियन कलैंडर का प्रचलन कब आरंभ हुआ?
उत्तर :-  26 दिसंबर, 1925 में
 
36.  ‘इस्तांबुल’ का पुराना नाम क्या था?
उत्तर :-  कुस्तुनतुनिया (कांस्टेटिनोपल)
 
37.  कमाल पाशा की मृत्यु कब हुई?
उत्तर :- 1938 में,
 
38.  प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के साथ अपमानजनक संधि कब हुई?
उत्तर :- 10 अगस्त, 1920 में 
 
39.  प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के साथ हुई अपमानजनक संधि को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :-  सेवा की संधि 
 
40.  लॉजान की संधि कब हुई?
उत्तर :- 24 अगस्त, 1923 में 
 
41.  लॉजान की संधि किस-किस के मध्य हुई?
उत्तर :-  तुर्की और यूनान 
 
42.  तुर्की में ‘रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी’ के संस्थापक कौन थे?
उत्तर :-  मुस्तफा कमाल पाशा 
 
43.  तुर्की में गणतंत्र की स्थापना कब हुई?
उत्तर :-  1923 में 
 
44.  तुर्की में नए संविधान की घोषणा कब की गई?
उत्तर :-  20 अप्रैल, 1924 में 
 
45.  जापान के साम्राज्यवाद का पहला शिकार कौन-सा राष्ट्र हुआ?
उत्तर :- चीन 
 
46.  जापान में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की शुरूआत किसने की?
उत्तर :- मूत सुहीतो ने 
 
47.   जापान की सैनिक सेवा अनिवार्य कब की गई?
उत्तर :-  1872 में
 
48.  जापान ने राष्ट्र संघ की सदस्यता कब छोड़ी?
उत्तर :-  24 फरवरी, 1933 में
 
49.  जापान का द्वार अमेरिकी व्यापार के लिए किसने खोला?
उत्तर :-  अमेरिकी नाविक पेरी ने 
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