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Sant Kabir Das के 103 प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित | Sant Kabir Ke Dohe

Sant Kabir Ke Dohe
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Sant Kabir Das के 103 प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित |  Sant Kabir Ke Dohe

एक महान रहस्यवादी कवि, कबीर दास, भारतीय में अग्रणी आध्यात्मिक कवियों में से एक हैं । उन्होंने लोगों के जीवन को बढ़ावा देने के लिए अपने दार्शनिक विचार दिए हैं। भगवान और कर्म में एक वास्तविक धर्म के रूप में उनकी पवित्रता के दर्शन ने लोगों के मन को अच्छाई की ओर बदल दिया है। भगवान के प्रति उनका प्रेम और भक्ति मुस्लिम सूफी और हिंदू भक्ति दोनों की अवधारणा को पूरा करती है।

आइये देखते हैं कुछ ज्ञानवर्धक Sant Kabir Ke Dohe (Dohas of Kabir Das) हिंदी अर्थ सहित. Kabir Das Ke Dohe PDF में download करने के लिए नीचे जाएँ.

जरुर पढ़े… 

कबीर दास के दोहे
 
1.

  जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
 
अर्थ :- सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी                  मयान का – उसे ढकने वाले खोल का। Kabir Das
2.
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
 
अर्थ :- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे                   तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !
 
 
 
3.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
 
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता                    है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है ! Sant kabir dohe
 
 
4.
लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट । 
पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट ॥
 
अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना                  चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम                           भगवान्  की पूजा क्यों नहीं की ।
 
5.
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । 
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥ 
 
अर्थ :- कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और                     जोआज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !
 
 
6.
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 
 
अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये , मैं खुद                  भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ। (kabir das ke dohe in hindi)
 
 
7.
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥ 
 
अर्थ :- कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं                          करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों !
 
 
 
8.
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
 
अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा                   भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।
 
9.
पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत ॥ 
 
अर्थ :- पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला                    ही क्यों न हो. फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है !
 
 
 
10.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
 
अर्थ :- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर                      देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
 
 
 
11.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।


अर्थ :- बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके।               कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का                 वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
 
 
 
12.
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
 
अर्थ :- इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को                      बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे। Kabir Ke Dohe
 
 
 
13.
देह धरे का दंड है सब काहू को होय । 
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥ 
 
अर्थ :- देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है. अंतर इतना ही है  कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट  रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए – दुखी मन से सब कुछ झेलता है !
 
 
 
14.
कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥ 
 
अर्थ :- इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक  सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं | (dohe in hindi)
 
 
 
15.
मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग ।तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥ 
 
अर्थ :- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उससे तो कौआ भला है जिसका                      तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है
 
 
 
16.
रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय । 
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥
 
अर्थ :- रात सो कर बिता दी, दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य                          विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है ?
 
 
 
17.
हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार । 
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार ॥
 
अर्थ :- दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक       दिन जल जाता है. समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे गुहार करूं – विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है !
 
 
 
18.
पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥
 
अर्थ :- बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर                  कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है – ऐसे पठन मनन से क्या                        लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?
 
 
 
19.
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
 
अर्थ :- कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं                  बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस                   माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
 
 
 
20.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
 
अर्थ :- जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय                    से  किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।
 
21.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
 

अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह  ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।(dohe of kabir in hindi)



22.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, 
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

 
23.
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत 
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।
अर्थ :- सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

Sant Kabir Das Ji Ke Dohe In Hindi

24.
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं। 
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
अर्थ :- इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।
 




25.
कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। 
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।
 
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।
 



26.
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।
 
अर्थ :- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।
 


27.
कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय। 
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।
 
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा
 
 
 
28.
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। 
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।
 
 
 
 
29.
मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई। 
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।
 
अर्थ :- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।




30.
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।
 
अर्थ :- जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।


 
31.
कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी । 
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।
 
अर्थ :- कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?(sant kabir ke dohe in hindi)
 


32.
 आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत । 
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ।।
 
अर्थ :- देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।



33.
 रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । 
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥
 
अर्थ :- रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी Sant Kabir




34.
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥
 
अर्थ :- खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ, जो ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है और न ही उसके फल सुलभ होते हैं।


35.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, 
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
 
अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।



36.
हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥
 
अर्थ :- पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है.सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? अर्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ?



37.
झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह। 
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥
 
अर्थ :- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.




38.
कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन। 
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥
अर्थ :- कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है.


39.
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण। 
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण॥
 
अर्थ :- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.




40.
झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥
 
अर्थ :- थोड़ा सा जीवन है, उसके लिए मनुष्य अनेक प्रकार के प्रबंध करता है. चाहे राजा हो या निर्धन चाहे बादशाह – सब खड़े खड़े ही नष्ट हो गए.

Sant Kabir Ke Dohe

41.
इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह। 
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय॥
अर्थ :- : एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सबसे बिछुड़ना पडेगा. हे राजाओं ! हे छत्रपतियों ! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते !(hindi kabir das ke dohe)




42.
कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उसअतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है, कुछ प्राप्त नहीं कर पाता.




43.
मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह॥
अर्थ :- मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह – सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है.


44.
जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ। 
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥
अर्थ :- जो जाता है उसे जाने दो. तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो. यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे.




45.
मानुष जन्म दुलभ है, देह न बारम्बार।
तरवर थे फल झड़ी पड्या,बहुरि न लागे डारि॥
अर्थ :- मानव जन्म पाना कठिन है. यह शरीर बार-बार नहीं मिलता. जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुन: उसकी डाल पर नहीं लगता .


46.
यह तन काचा कुम्भ है,लिया फिरे था साथ। 
ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ॥
अर्थ :- यह शरीर कच्चा घड़ा है जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता था.जरा-सी चोट लगते ही यह फूट गया. कुछ भी हाथ नहीं आया.




47.
मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि। 
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि॥
अर्थ :- अहंकार बहुत बुरी वस्तु है. हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ. मित्र, रूई में लिपटी इस अग्नि – अहंकार – को मैं कब तक अपने पास रखूँ?




48.
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई । 
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा – जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते ! 


49.
जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ॥
अर्थ :- जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता – वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं. प्रेम जीवन की सार्थकता है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है.


50.
लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार॥
अर्थ :- घर दूर है मार्ग लंबा है रास्ता भयंकर है और उसमें अनेक पातक चोर ठग हैं. हे सज्जनों ! कहो , भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो?संसार में जीवन कठिन है – अनेक बाधाएं हैं विपत्तियां हैं – उनमें पड़कर हम भरमाए रहते हैं – बहुत से आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं – हम अपना लक्ष्य भूलते रहते हैं – अपनी पूंजी गंवाते रहते हैं

Kabir Dohe

51.
इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥
अर्थ :- इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूं – इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? ईश्वर से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन-मन को लगाना एक साधना है तपस्या है – जिसे कोई कोई विरला ही कर पाता है ! Kabir das ke dohe



52.
नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ॥
अर्थ :- हे प्रिय ! ( प्रभु ) तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं ! फिर न तो मैं किसी दूसरे को देखूं और न ही किसी और को तुम्हें देखने दूं !




53.
कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई। नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई ॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?




54.
कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास ।
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है. स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है. हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है.




55.
सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग ।
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग ॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं – उनपर कौए बैठने लगे हैं. हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता ! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है – यह इस संसार में होता है !.




56.
कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास । 
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास॥
अर्थ :- कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो ? कल या परसों ये ऊंचाइयां और (आप भी) धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी ! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है ! इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए




57.
जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि ।
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि ॥
अर्थ :- जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर – उसे ही याद रख – उसे ही संवार सुन्दर बना  kabir dohe



58.
बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥
अर्थ :- रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया. कुछ खेत अब भी बचा है – यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ – उसे बचा लो ! जीवन में असावधानी के कारण इंसान बहुत कुछ गँवा देता है – उसे खबर भी नहीं लगती – नुक्सान हो चुका होता है – यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं ! इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को -( जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर – अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ! 
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Teen Akshar Wale Shabd – तीन अक्षर वाले शब्द चित्र सहित

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हेलो फ्रेंड्स, आज की इस पोस्ट में हम teen akshar wale shabd ( Three Letters Words in Hindi ) के बारे में पढेगे. इंटरनेट पर बहुत से लोग तीन अक्षर वाले शब्द चित्र सहित को ढूंढ़ते रहते है इसलिए इस पोस्ट में मैं आपको बिना मात्रा और मात्राओ के teen akshar wale shabd बताने जा रहा हूँ.

बहुत से पेरेंट्स अपने बचो को जो LKG, UKG में पढाते है, हिंदी में पड़ना और लिखना सीखने के लिए तीन अक्षर वाले शब्द इंटरनेर पर सर्च करते रहते है इसलिए इस पोस्ट में आपको इन शब्दों को प्रोवाइड करने वाला हूँ तो दोस्तों चलिए शुरु करते है.

जरुर पढ़े… 

तीन अक्षर वाले शब्द – Three Letter Words in Hindi

भगतशहद
मगरचरण
औरतनयन
चरमपरम
नगरउधर
कहरकसम
महलकमर
भरणसड़क
नरमबटन
जलदबतख
हवनलहर
गगनवचन
कमलअगर
कलशमटर
भजनगरम
चमकडगर
पहलफसल
पहरकहर

पढ़ो और याद करो

रमन इधर-उधर मत टहल। झगड़ मत। अमर सड़क पर मत टहल। अगर-मगर मत कर। जग को उधर रख। रजत नहर तक चल। बत्तख मत पकड़। अमर कमल पकड़। गरम-गरम मटर चख। रजत शहद चक। दमन मटक-मटक कर मत चल। अटक-अटक कर मत। चल अटक-अटक कर मत चल।

तो दोस्तों किसी लगी आपको यह 3 akshro wale shabd की पोस्ट हमें कमैंट्स कर के जरूर बताये और अगर आपको इन शब्दों के अलावा कोई और शब्द भी पता है तो हमें कमैंट्स कर के जरूर बताये और इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूलें.

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Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi ( All Chapter – One PDF )

Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi
Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi

Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi ( All Chapter – One PDF )

Physics Handwriting Notes Download : Dears Readers, आज हम आपके लिए physics Subjects से सम्बंधित Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi ( All Chapter – One PDF ) note लेकर आये है|12th Class Physics Notes All Subjects Handwritten नोट्स है | आप सभी विद्यार्थियों को बता दे की, अक्सर छात्र-छात्राएं Polytechnic 12 Class Physics Notes PDF in Hindi, Bihar Polytechnic Physics Handwritten Notes PDF, UP Board Intermediate Physics Notes in Hindi, Physics Handwritten Notes All Subjects in Hindi, Physics Hindi Notes PDF, Air force Physics Notes, And Physics Entrance Exam Notes की तैयारी करने के लिए विद्यार्थी माग करते है | इसलिए आज हम आपके सभी परीक्षाओं को ध्यान में रख-कर आप सभी विद्यार्थी के लिए लेकर “12th Class Physics Notes PDF” को लेकर आए है, जिन्हें आप सभी विद्यार्थी निचे दिए गए Table के माध्यम से Chapter-wise पीडीऍफ़ को आसानी से डाउनलोड करके पढाई कर सकते है |

Why 12th Class Physics Notes In Hindi Are Important

  • ये नोट्स प्रभावी रूप से लिखे गए हैं।
  • ये समझने में आसान हैं।
  • क्योकि इन नोट्स मे डायग्राम दिए गए है इसलिए concept को समझना आसान है।
  • These Notes are Chapter-wise.
  • Notes are available in both English and Hindi language

12th Class Physics Notes in Hindi PDF – भौतिक विज्ञानं नोट्स

ALTERNATING CURRENT CLASS 12 NOTES PDFDownload
MAGNETISM CLASS 12 NOTES PDFDownload
ELECTROMAGNETIC INDUCTION CLASS 12 NOTES PDFDownload
ELECTROSTATICS NOTES PDF DOWNLOADDownload
ELECTRIC CHARGES AND FIELDS CLASS 12 NOTES PDFDownload
ATOMIC AND NUCLEUS PHYSICS HANDWRITTENDownload
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OPTICS HANDWRITTENDownload
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Physics Notes for Class 12 PDF in Hindi ( All Chapter – One PDF )

नोट : अगर आप सभी विद्यार्थी Class 12 physics notes chapter-wiseनहीं डाउनलोड करना चाहते है, तो आप complete compress पीडीऍफ़ को निचे दिए गए लिनक्स के माध्यम से डाउनलोड कर सकते है |

Download Physics Notes for Class 12th

Book Name12th physics notes
Format PDF
QualityVery Good
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Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination

Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination
Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination

Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination

Physics Handwriting Notes Download : Dears Readers, आज हम आपके लिए physics Subjects से सम्बंधित Short Notes POF के माध्यम से लेकर आए है | जो आपके Entrance Exam से लेकर Competitive Exam की तैयारी करने के लिए बहुत ही अच्छी Physics Handwriting Notes है| यह Notes Polytechnic, IERT, Allahabad University Entrance Exam 2020 And Other Entrance एग्जाम की तैयारी करने के लिए और SSC, Bank,Railway,IAS, PCS जैसे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिएहै जिसे आप डाउनलीड करके अपनी तैयारी अच्छे से कर सकेगे.

इसे भी पढ़े…

Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination- Contents Part-1 and 2:-

  • भौतिक राशियाँ
  • मापक यन्त्र
  • यांत्रिकी
  • पदार्थ व पदार्थ के गुण
  • केशिकत्व
  • श्यानता
  • बरनौली प्रमेय
  • आर्कमिडीज का सिद्धांत
  • प्रकाश
  • ताप एवं उष्मीय ऊर्जा
  • विद्युत एवं चुम्बकत्व
  • आधुनिक भौतिकी एवं विविध प्रश्न

Some Details About Pdf:- 

  • PDF Name:- Physics Handwriting Notes PDF Download For All Competitive Examination
  • Size:- 10, 15 MB
  • Pages:- 15, 20
  • Quality:- Good
  • Format:- PDF
  • Medium:- Hindi

 

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Physics Handwriting Notes PDF Download- Part 1

Physics Handwriting Notes PDF Download- Part 2

 
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[PDF] DOWNLOAD PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava

 PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava
PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava

[PDF] DOWNLOAD PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava

[PDF] DOWNLOAD PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava:- नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हमारी वेबसाइट पर ! आज के इस Article में हम आपके लिए लेकर आए हैं “[PDF] DOWNLOAD PHYSICS HANDWRITTEN NOTES FOR IITJEE BY Ambarish Srivastava” ! आज हम आपके लिए Physics से सम्बंधित Notes PDF के माध्यम से लेकर आए है| जो आपके Competitive Exam की तैयारी करने के लिए बहुत ही अच्छी Physics Handwriting Notes है| आपकी जानकारी के लिए बता दे Physics Handwritten Notes PDF Download करने के लिए निचे दिए गए PDF Download के Button पर Click कर सकते हैं।

Now download chapter wise handwritten notes for physics IIT JEE Ambarish Srivastava.

CONTENT:
• Vectors Algebra
• Calculus
• Kinematics
• Relative Velocity
• Laws of Motion
•Friction

Notebook 1: CLASS XI, up to conservation of momentum
Notebook 2: CLASS XI, Collision to waves, Including Thermodynamics
Notebook 3: Waves continued
Notebook 4. CLASS XII Flectrostatics to magneticS
Notebook 5. EMI, A.C Waye Optics, ay Optics, Miodern semiconductors, optical
instruments, Diodes only errors analysis.
Notebook 6: Semiconductors incl transistors and communication, Principles polarization

Physics notes 1Download PDF
Physics notes 2Download PDF
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Gender in Hindi, Ling Examples, Types and Definition

Gender in Hindi, Ling Examples, Types and Definition
Gender in Hindi, Ling Examples, Types and Definition

Gender in Hindi, Ling Examples, Types and Definition

Gender in Hindi, Ling (लिंग):  इस लेख में हम लिंग की परिभाषा, उनके भेद और नियमों को उदहारण सहित जानेंगे। लिंग का अभिप्राय भाषा की ऐसी अनुकूल परिस्थितियों से है, जो वाक्य के कर्ता के अनुसार बदल जाते हैं। विश्व की लगभग सभी भाषाओं में किसी न किसी प्रकार की लिंग व्यवस्था होती है। हिंदी में दो लिंग होते हैं (पुलिंग-स्त्रीलिंग), जबकि संस्कृत में तीन लिंग होते हैं (पुलिंग-स्त्रीलिंग-नपुंसकलिंग), फारसी जैसी भाषाओं में लिंग होता नहीं और अंग्रेजी में लिंग सिर्फ सर्वनाम में होता है।

ये सब जानने पर आपको लग सकता है कि लिंग पहचानना कौन सा मुश्किल काम है? परन्तु लिंग की पहचान करते समय बहुत से विद्यार्थी कठिनाइयों का सामना करते है। इस समस्या का समाधान हम इस लेख के माध्यम से करेंगे।

लिंग किसे कहते हैं? लिंग के कितने भेद हैं? लिंग की पहचान के क्या-क्या नियम हैं? इन प्रश्नों की सम्पूर्ण जानकारी बहुत ही सरल भाषा में इस लेख में दी गई है

जरुर पढ़े… 

लिंग की परिभाषा – Definition

“संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का बोध हो, उसे व्याकरण में ‘लिंग’ कहते है।”

दूसरे शब्दों में  संज्ञा शब्दों के जिस रूप से उसके पुरुष या स्त्री जाति होने का पता चलता है, उसे लिंग कहते है।

जैसे-

पुरुष जाति – बैल, बकरा, मोर, मोहन, लड़का आदि।
स्त्री जाति – गाय, बकरी, मोरनी, मोहिनी, लड़की आदि।

‘लिंग’ संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘चिह्न’ या ‘निशान’। चिह्न या निशान किसी संज्ञा का ही होता है। ‘संज्ञा’ किसी वस्तु के नाम को कहते है और वस्तु या तो पुरुषजाति की होगी या स्त्रीजाति की। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक संज्ञा या तो पुलिंग होगी या स्त्रीलिंग।

संज्ञा के भी दो रूप हैं।
एक – अप्रणिवाचक संज्ञा – लोटा, प्याली, पेड़, पत्ता इत्यादि
दूसरा – प्राणिवाचक संज्ञा – घोड़ा-घोड़ी, माता-पिता, लड़का-लड़की इत्यादि।

लिंग के निर्माण में आने वाली कठिनाइयाँ –

हिंदी में लिंग के निर्णय का आधार संस्कृत के नियम ही हैं। संस्कृत में हिंदी से अलग एक तीसरा लिंग भी है, जिसे नपुंसकलिंग कहते हैं। नपुंसकलिंग में अप्राणीवाचक संज्ञाओं को रखा जाता है। हिंदी में अप्राणीवाचक संज्ञाओं के लिंग निर्णय में सबसे अधिक कठिनाई हिंदी न जानने वालों को होती है।

जिनकी मातृभाषा हिंदी होती है, उन्हें सहज व्यवहार के कारण लिंग निर्णय में परेशानी नहीं होती। लेकिन इनमें भी एक समस्या है की कुछ पुल्लिंग शब्दों के पर्यायवाची स्त्रीलिंग हैं और कुछ स्त्रीलिंग के पुल्लिंग। जैसे – पुस्तक को स्त्रीलिंग कहते हैं और ग्रन्थ को पुल्लिंग।

व्याकरणाचार्य ने लिंग निर्णय के कुछ नियम बताये हैं –

1. जब प्राणीवाचक संज्ञा पुरुष जाति का बोध कराएँ तो वे पुल्लिंग होते हैं और जब स्त्रीलिंग का बोध कराएँ तो स्त्रीलिंग होती हैं।

जैसे – कुत्ता, हाथी, शेर पुल्लिंग हैं
कुत्तिया, हथनी, शेरनी स्त्रीलिंग हैं।

2. कुछ प्राणीवाचक संज्ञा जब पुरुष और स्त्री दोनों लिंगों का बोध करती है तो वे नित्य पुल्लिंग में शामिल हो जाते हैं।

जैसे – खरगोश, खटमल, गैंडा, भालू, उल्लु आदि।

3. कुछ प्राणीवाचक संज्ञा जब पुरुष और स्त्री दोनों का बोध करे तो वे नित्य स्त्रीलिंग में शामिल हो जाते हैं।

जैसे – कोमल, चील, तितली, छिपकली आदि।

 

लिंग के भेद – Types of Ling

सारी सृष्टि की तीन मुख्य जातियाँ हैं-
(1) पुरुष (2) स्त्री (3) जड़।

अनेक भाषाओं में इन्हीं तीन जातियों के आधार पर लिंग के तीन भेद किये गये हैं-

 

ling

इसके विपरीत, हिन्दी में दो ही लिंग – पुंलिंग और स्त्रीलिंग हैं। नपुंसकलिंग यहाँ नहीं हैं। अतः, हिन्दी में सारे पदार्थवाचक शब्द, चाहे वे चेतन हों या जड़, स्त्रीलिंग और पुलिंग, इन दो लिंगों में विभक्त है।

पुल्लिंग

जिन संज्ञा के शब्दों से पुरुष जाति का पता चलता है, उसे पुल्लिंग कहते हैं।

जैसे – पिता, राजा, घोडा, कुत्ता,  आदमी, सेठ, मकान, लोहा, चश्मा, खटमल, फूल, नाटक, पर्वत, पेड़, मुर्गा, बैल, भाई, शिव, हनुमान, शेर आदि।

पुल्लिंग अपवाद

कुछ ऐसे भी शब्द होते हैं जिन्हें मुख्यतः अज्ञानता के कारण पुलिंग होते हुए भी स्त्रीलिंग समझने की भूल की जाती है –
पक्षी, फरवरी, एवरेस्ट, मोतिया, दिल्ली, स्त्रीत्व आदि।

पुल्लिंग की पहचान

1. जिन शब्दों के पीछे अ, त्व, आ, आव, पा, पन, न आदि प्रत्यय आये वे पुल्लिंग होते हैं।
जैसे – मन, तन, वन, शेर, राम, कृष्ण, सतीत्व, देवत्व, मोटापा, चढ़ाव, बुढ़ापा, लडकपन, बचपन, लेन-देन आदि।

2. पर्वतों के नाम पुल्लिंग होते हैं।
जैसे – हिमालय, विघ्यांच्ल, आल्प्स, कंचनजंगा, एवरेस्ट, फूजियामा, कैलाश, मलयाचल, माउन्ट एवरेस्ट आदि।

3. दिनों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – सोमवार, मंगलवार, बुद्धवार, वीरवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार आदि।

4. देशों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – भारत, चीन, ईरान, यूरान, रूस, जापान, अमेरिका, हिमाचल, मध्य प्रदेश आदि।

5. धातुओं के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – सोना, तांबा, पीतल, लोहा,चाँदी, पारा आदि।

6. कुछ नक्षत्रों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – सूर्य, चन्द्र, राहू, आकाश, शनि, बुद्ध, बृहस्पति, मंगल, शुक्र आदि।

7. महीनों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – फरवरी, मार्च, चैत्र, आषाढ़, फागुन आदि।

8. द्रवों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – पानी, तेल, पेट्रोल, घी, शरबत, दही, दूध आदि।

9. पेड़ों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – केला, पपीता, शीशम, सागौन, बरगद, पीपल, नीम, आम, अमरुद, देवदार, अनार आदि।

10. सागर के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर, अरब महासागर आदि।

11. समय के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – घंटा, पल, क्षण, मिनट, सेकेंड आदि।

12. अनाजों के नाम भी पुल्लिंग होते हैं
जैसे – गेंहूँ, बाजरा, चना, जौ आदि।

13. वर्णमाला के कुछ अक्षरों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – अ, उ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, च, छ, य, र, ल, व्, श आदि।

14. कुछ प्राणीवाचक शब्द ऐसे होते हैं जो हमेशा पुरुष जाति का ही बोध करते हैं
जैसे – बालक, गीदड़, कौआ, कवि, साधु, खटमल, भेडिया, खरगोश, चीता, मच्छर, पक्षी आदि।

15. समूह वाचक संज्ञा भी पुल्लिंग होती है
जैसे – मण्डल, समाज, दल, समूह, सभा, वर्ग, पंचायत आदि।

16. भारी और बेडौल वस्तु भी पुल्लिंग होती हैं
जैसे – जूता, रस्सा, पहाड़, लोटा आदि।

17. रत्नों के नाम भी पुल्लिंग होते हैं
जैसे – नीलम, पुखराज, मूँगा, माणिक्य, पन्ना, मोती, हीरा आदि।

18. फूलों के नाम पुल्लिंग होते हैं
जैसे – गेंदा, मोतिया, कमल, गुलाब आदि।

19. द्वीप भी पुल्लिंग होते हैं
जैसे – अंडमान-निकोबार, जावा, क्यूबा, न्यू फाउंलैंड आदि।

20. शरीर के अंग पुल्लिंग होते हैं
जैसे – हाथ, पैर, गला, अंगूठा, कान, सिर, मुंह, घुटना, ह्रदय, दांत, मस्तक आदि।

21. दान, खाना, वाला जैसे शब्दांशों से खत्म होने वाले शब्द हमेशा पुल्लिंग होते हैं
जैसे – खानदान, पीकदान, दवाखाना, जेलखाना, दूधवाला, दुकानवाला आदि।

22. कुछ आकारान्त संज्ञा वाले शब्द भी पुल्लिंग होते है
जैसे – गुस्सा, चश्मा, पैसा, छाता आदि।

अब कुछ पुल्लिंग शब्द और उनके प्रयोग के उदहारण देखेंगे। इनमें कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिन्हें आप आकारांत या इकारांत होने के कारण स्त्रीलिंग समझने की भूल करते हैं

1. प्राण – उसके प्राण उड़ गये।

2. घी – घी महँगा है।

3. आईना – आईना टूट गया।

4. आयोजन – पूजा का आयोजन हो रहा है।

5. अम्बार – किताबों का अम्बार लगा हुआ है।

6. आँसू – मोहन के आँसू निकल पड़े।

7. इत्र – यह जैस्मिन का इत्र है।

8. ईंधन – ईंधन जला दिया गया।

9. कुआँ – कुआँ गहरा है।

10. कुहासा – कुहासा छाया हुआ है।

11. गिरगिट – गिरगिट रंग बदल सकता है।

12. घाव – घाव पक कर गहरा हो गया है।

13. चुनाव – चुनाव आने वाला है।

14. जहाज – जहाज डूब गया है।

15. जेल – यह मुम्बई का जेल है।

16. जौ – जौ का स्वाद अच्छा नहीं होता है।

17. टिकट – यह बस का टिकट है।

18. तकिया – यह राधा का तकिया है।

19. तीर – हाथ से अचानक तीर छुट गया।

20. नीड़ – पंछी नीड़ में रहते है।

21. पतंग – पतंग उड़ रहा है।

22. पहिया – पहिया टूट चूका है।

23. बोझ – उसके सिर पर बोझ रखा है।

24. मोती – मोती चमकता रहता है।

25. मोम – मोम पिघल रहा है।

26. सींग – गाय के दो सींग होते हैं।

27. होश – उनके होश उड़ चुके हैं।

28. पानी – पानी साफ है।

29. दही – दही बहुत खट्टा होता है।

30. गीत – वह गीत बहुत अच्छा है।

स्त्रीलिंग

जिन संज्ञा शब्दों से स्त्री जाति का पता चलता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं।

जैसे – हंसिनी, लडकी, बकरी, माता, रानी, जूं, सुईं, गर्दन, लज्जा, नदी, शाखा, मुर्गी, गाय, बहन, यमुना, बुआ, लक्ष्मी, गंगा, नारी, झोंपड़ी, लोमड़ी आदि ।

स्त्रीलिंग के अपवाद

जैसे – जनवरी, मई, जुलाई, मक्खी, ज्वार, अरहर, मूंग, चाय, लस्सी, चटनी, इ, ई, ऋ, जीभ, आँख, नाक, सभा, कक्षा, संतान, प्रथम, तिथि, छाया, खटास, मिठास, आदि।

स्त्रीलिंग प्रत्यय

जब पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग बनाया जाता है, तब प्रत्ययों को शब्दों में जोड़ा जाता है, जिन्हें स्त्रीलिंग प्रत्यय कहते हैं ।

जैसे –

ई = बड़ा-बड़ी, भला-भली आदि।

इनी = योगी-योगिनी, कमल-कमलिनी आदि।

इन = धोबी-धोबिन, तेल-तेली आदि।

नि = मोर-मोरनी, चोर-चोरनी आदि।

आनी = जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी आदि।

आइन = ठाकुर-ठकुराइन, पंडित-पण्डिताइन आदि।

इया = बेटा-बिटिया, लोटा-लुटिया आदि।

स्त्रीलिंग की पहचान

1. जिन संज्ञा शब्दों के पीछे ख, ट, वट, हट, आनी आदि आयें वे सभी स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – कडवाहट, आहट, बनावट, शत्रुता, मूर्खता, मिठाई, छाया, प्यास, ईख, भूख, चोख, राख, कोख, लाख, देखरेख, झंझट, आहट, चिकनाहट, सजावट, इन्द्राणी, जेठानी, ठकुरानी, राजस्थानी आदि ।

2. अनुस्वारांत, ईकारांत, उकारांत, तकारांत, सकारांत आदि संज्ञाएँ आती है वे स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – रोटी, टोपी, नदी, चिट्ठी, उदासी, रात, बात, छत, भीत, लू, बालू, दारू, सरसों, खड़ाऊं, प्यास, वास, साँस, नानी, बेटी, मामी, भाभी आदि।

3. भाषा, बोलियों तथा लिपियों के नाम स्त्रीलिंग होती हैं
जैसे – हिंदी, संस्कृत, देवनागरी, पहाड़ी, अंग्रेजी,पंजाबी गुरुमुखी, फ्रांसीसी, अरबी, फारसी, ज़र्मन, बंगाली, रुसी आदि।

4. नदियों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं
जैसे – गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, रावी, कावेरी, कृष्णा, व्यास, सतलुज, झेलम, ताप्ती, नर्मदा आदि।

5. तारीखों और तिथियों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – पहली, दूसरी, प्रतिपदा, पूर्णिमा, पृथ्वी, अमावस्या, एकादशी, चतुर्थी, प्रथमा आदि।

6. कुछ नक्षत्रों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – अश्विनी, भरणी, रोहिणी, रेवती, मृगशिरा, चित्रा आदि।

7. कुछ संज्ञाएँ हमेशा स्त्रीलिंग रहने वाली होती हैं।
जैसे – मक्खी, कोयल, मछली, तितली, मैना आदि।

8. कुछ समूहवाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग भी होती हैं।
जैसे – भीड़, कमेटी, सेना, सभा, कक्षा आदि।

9. कुछ प्राणीवाचक संज्ञा स्त्रीलिंग होती हैं।
जैसे – धाय, संतान, सौतन आदि।

10. पुस्तकों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – कुरान, रामायण, गीता, रामचरितमानस, बाइबल, महाभारत आदि।

11. कुछ आहारों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – सब्जी, दाल, कचौरी, पूरी, रोटी, पकोड़ी आदि।

12. कुछ शरीर के अंगों के नाम भी स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – आँख, नाक, जीभ, पलक, उँगली, ठोड़ी आदि।

13. आभूषणों और वस्त्रों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – साड़ी, सलवार, चुन्नी, धोती, टोपी, पेंट, कमीज, पगड़ी, माला, चूड़ी, बिंदी, कंघी, नथ, अंगूठी आदि।

14. मसालों के नाम भी स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – दालचीनी, लौंग, हल्दी, मिर्च, धनिया, इलायची, अजवाइन, सौंफ, चाय आदि।

15. राशि के नाम स्त्रीलिंग होते हैं।
जैसे – कुम्भ, मीन, तुला, सिंह, मेष, कर्क आदि।

स्त्रीलिंग के शब्द और प्रयोग जिन्हें कभी-कभी भ्रमवश पुलिंग समझा जाता है –

1. आँख – उनकी आँख बहुत छोटी-छोटी हैं।

2. आग – घर में आग लग गई।

3. इच्छा – मेरी इच्छा सोने की हैं।

4. ईट – ईंट बिलकुल पक चुकी है।

5. उम्र – तुम्हारी उम्र लंबी है।

6. कब्र – कब्र खोदी जा चुकी है।

7. कसम – मैंने उनकी कसम खायी है।

8. कलम – कलम टूट चुकी है।

9. गर्दन – मेरी गर्दन फंस गई है।

10. चाल – घोड़े की चाल अच्छी होती है।

11. चील – चील आकाश में उड़ रही है।

12. छत – छत टूट चुकी है।

13. जीभ – जीभ कटी नहीं है।

14. टाँग – मेरी टाँग टूटने से बच गई है।

15. किताब – किताब बहुत पुरानी है।

16. दीवार – दीवार गिर चुकी है।

17. धूप – धूप निकल गई है।

18. बर्फ – बर्फ गिर चुकी है।

19. बूंद – पानी की बुँदे एक-एक करके गिर रही हैं।

20. भीड़ – वहाँ पर भीड़ लग रही थी।

21. शराब – शराब बहुत महंगी है।

22. सजा – उसे दो साल की सजा हुई है।

शब्दों का लिंग परिवर्तन

 

पुल्लिंग

स्त्रीलिंग

1.

कवि

कवियित्री

2.

विद्वान्

विदुषी

3.

नेता

नेत्री

4.

महान

महती

5.

साधु

साध्वी

6.

दादा

दादी

7.

बालक

बालिका

8.

घोडा

घोड़ी

9.

शिष्य

शिष्या

10.

छात्र

छात्रा

11.

बाल

बाला

12.

धोबी

धोबिन

13.

पंडित

पण्डिताइन

14.

हाथी

हथिनी

15.

ठाकुर

ठकुराइन

16.

नर

मादा

17.

पुरुष

स्त्री

18.

युवक

युवती

19.

सम्राट

सम्राज्ञी

20.

मोर

मोरनी

21.

सिंह

सिंहनी

22.

सेवक

सेविका

23.

अध्यापक

अध्यापिका

24.

पाठक

पाठिका

25.

लेखक

लेखिका

26.

दर्जी

दर्जिन

27.

ग्वाला

ग्वालिन

28.

मालिक

मालकिन

29.

शेर

शेरनी

30.

ऊँट

ऊंटनी

31.

गायक

गायिका

32.

शिक्षक

शिक्षिका

33.

वर

वधू

34.

श्रीमान

श्रीमती

35.

भेड़

भेडा

36.

नाग

नागिन

37.

पडोस

पड़ोसिन

38.

मामा

मामी

39.

बलवान

बलवती

40.

नर तितली

तितली

41.

भेडिया

मादा भेडिया

42.

नर मक्खी

मक्खी

43.

कछुआ

मादा कछुआ

44.

नर चील

चील

45.

खरगोश

मादा खरगोश

46.

नर चीता

चीता

47.

भालू

मादा भालू

48.

नर मछली

मछली

49.

घोडा

घोड़ी

50.

देव

देवी

 

 विशेष

कुछ शब्द ऐसे हैं, जो स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों रूपों में प्रयोग किए जाते है-
जैसे-

(1) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, चित्रकार, पत्रकार, प्रबंधक, सभापति, वकील, डॉक्टर, सेक्रेटरी, गवर्नर, लेक्चर, प्रोफेसर आदि।

(2) बर्फ, मेहमान, शिशु, दोस्त, मित्र आदि।

इन शब्दों के लिंग का परिचय योजक-चिह्न, क्रिया अथवा विशेषण से मिलता है।

यहाँ कुछ वाक्यों से ज्ञात करेंगे कि किस तरह से इन शब्दों के लिंग को पहचाना जा सकता है-

(i) भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल हैं।

(ii) एम० एफ० हुसैन भारत के प्रसिद्ध चित्रकार हैं।

(iii) मेरी मित्र कॉलेज में लेक्चरर है।

(iv) हिमालय पर जमी बर्फ पिघल रही हैं

(v) दुख में साथ देने वाला ही सच्चा दोस्त कहलाता है।

(vi) मेरे पिताजी राष्ट्रपति के सेक्रेटरी हैं।

पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम

पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम इस प्रकार हैं –

1. अ, आ पुल्लिंग शब्दों को जब ‘ई’ कर दिया जाता है, तो वे स्त्रीलिंग हो जाते हैं।

उदाहरण –
(i) गूँगा = गूँगी
(ii) गधा = गधी
(iii) देव = देवी
(iv) नर = नारी
(v) नाला = नाली
(vi) नाना = नानी
(vii) मोटा = मोटी

2. जब अ, आ, वा आदि पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग में बदला जाता है, तो अ, आ, तथा वा की जगह पर ‘इया’ लगा दिया जाता है।

उदाहरण –
(i) लोटा = लुटिया
(ii) बन्दर = बंदरिया
(iii) बुढा = बुढिया
(iv) बेटा = बिटिया
(v) चिड़ा = चिड़िया
(vi) कुत्ता = कुतिया
(vii) चूहा = चुहिया

3. अक जैसे तत्सम शब्दों में ‘इका’ जोडकर भी स्त्रीलिंग बनाए जाते हैं।

उदाहरण –
(i) अध्यापक + इका = अध्यापिका
(ii) पत्र + इका = पत्रिका
(iii) चालक + इका = चालिका
(iv) सेवक + इका = सेविका
(v) लेखक + इका = लेखिका
(vi) गायक + इका = गायिका

4. जब पुल्लिंग को स्त्रीलिंग बनाया जाता है, तो कभी-कभी नर या मादा लगाना पड़ता है ।

उदाहरण –
(i) तोता = मादा तोता
(ii) खरगोश = मादा खरगोश
(iii) मच्छर = मादा मच्छर
(iv) जिराफ = मादा जिराफ
(v) खटमल = मादा खटमल
(vi) मगरमच्छ = मादा मगरमच्छ

5. कुछ शब्द स्वतंत्र रूप से स्त्री-पुरुष के स्वंय में ही जोड़े होते हैं। कुछ पुल्लिंग शब्दों के स्त्रीलिंग बिलकुल उल्टे होते हैं।

उदहारण –
(i) राजा = रानी
(ii) सम्राट = सम्राज्ञी
(iii) पिता = माता
(iv) भाई = बहन
(v) वर = वधू
(vi) पति = पत्नी

6. कुछ शब्दों का स्त्रीलिंग न हो पाने की वजह से उनमें ‘आनी’ प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग बनाया जाता है।

उदाहरण –
(i) ठाकुर + आनी = ठकुरानी
(ii) सेठ + आनी = सेठानी
(iii) चौधरी + आनी = चौधरानी
(iv) देवर +आनी = देवरानी
(v) नौकर + आनी = नौकरानी
(vi) इंद्र + आनी = इन्द्राणी
(vii) जेठ + आनी = जेठानी

7. कभी-कभी पुल्लिंग के कुछ शब्दों में ‘इन’ जोडकर स्त्रीलिंग बनाया जाता है।

उदाहरण –
(i) साँप + इन = सांपिन
(ii) सुनार + इन = सुनारिन
(iii) नाती + इन = नातिन
(iv) दर्जी + इन = दर्जिन
(v) कुम्हार + इन = कुम्हारिन
(vi) लुहार + इन = लुहारिन

8. कभी-कभी बहुत से शब्दों में ‘आइन’ जोडकर स्त्रीलिंग बनाए जाते हैं।

उदाहरण –
(i) चौधरी + आइन = चौधराइन
(ii) हलवाई + आइन = हलवाइन
(iii) गुरु + आइन = गुरुआइन
(iv) पंडित + आइन = पण्डिताइन
(v) ठाकुर + आइन = ठकुराइन
(vi) बाबू +आइन = बबुआइन आदि।

9. जब पुल्लिंग शब्दों में ता की जगह पर ‘त्री, लगा दिया जाता है, तो वे स्त्रीलिंग बन जाते हैं।

उदाहरण –
(i) नेता = नेत्री
(ii) दाता = दात्री
(iii) अभिनेता = अभनेत्री
(iv) रचयिता = रचयित्री
(v) विधाता = विधात्री

10. संस्कृत के पुल्लिंग शब्दों मान और वान को जब वती और मति में बदल दिया जाता है, तो वे स्त्रीलिंग में बदल जाते हैं।

उदाहरण –
(i) बुद्धिमान = बुद्धिमती
(ii) पुत्रवान = पुत्रवती
(iii) श्रीमान = श्रीमती
(iv) भाग्यवान = भाग्यवती
(v) आयुष्मान = आयुष्मती

11. संस्कृत के अकारांत शब्दों में आ लगा देने से वे स्त्रीलिंग हो जाते हैं।

उदाहरण –
(i) तनुज + आ = तनुजा
(ii) चंचल + आ = चंचला
(iii) आत्मज + आ = आत्मजा
(iv) सुत +आ = सुता
(v) प्रिय + आ = प्रिया          

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Shringar Ras in hindi – श्रृंगार रस की परिभाषा और उदाहरण

Shringar Ras in hindi - श्रृंगार रस की परिभाषा और उदाहरण
Shringar Ras in hindi – श्रृंगार रस की परिभाषा और उदाहरण

Shringar Ras in hindi – श्रृंगार रस की परिभाषा और उदाहरण

Shringar ras in hindi, Shringar ras ki Paribhasha, Shringar ras kya hota hai full notes, Sanyog Shringar ras ke Udaharan easy, Shringar ras poems in hindi, Easy Example of viyog shringar ras in hindi, Shringar ras simple example in hindi.Shringar Ras जहां पर नायक- नायिका, प्रेमी- प्रेमिका, स्त्री- पुरुष, पति-पत्नी के प्रेम का वर्णन होता है वहां श्रृंगार रस होता है। Shringar Ras श्रृंगार रस के व्यापक दायरे में वत्सल रस, भक्ति रस आ जाते हैं इसलिए रसों की संख्या 9 ही मानना ज्यादा उपयुक्त है। श्रृंगार रस रस दो प्रकार के होते हैं 1- संयोग श्रृंगार रस 2-वियोग श्रृंगार रस

जरुर पढ़े… 

श्रृंगार रस की परिभाषा

श्रृंगार रस

Shringar Ras Kya Hota Hai Full Notes-

श्रृंगार रस की परिभाषा (Shringar Ras Ki Paribhasha)-

श्रृंगार रस  (Shringar Ras) में नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस के अवस्था में पहुंच जाता है तो वह श्रृंगार रस (Shringar Ras) कहलाता है। इसके अंतर्गत वसंत ऋतु, सौंदर्य, प्रकृति, सुंदर वन, पक्षियों श्रृंगार रस के अंतर्गत नायिकालंकार ऋतु तथा प्रकृति का वर्णन भी किया जाता है। श्रृंगार रस (Shringar Ras) को रसराज या रसपति भी कहा जाता है। 

श्रृंगार रस के उदाहरण

तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाये। 
झके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।।

Shringar Ras

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय ।
सौंह करै, भौंहनु हँसे, देन कै नटि जाय ॥

श्रृंगार रस के भेद

श्रृंगार रस के दो भेद होते हैं संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार

संयोग श्रृंगार

जब नायक नायिका के परस्पर मिलन, स्पर्श, आलिंगन, वार्तालाप आदि का वर्णन होता है तब वहां पर संयोग श्रृंगार रस होता है। Shringar Ras

Shringar Ras Simple Example In Hindi

संयोग श्रृंगार रस का उदाहरण-

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय,
सौंह करे भौंहन हंसे देन कहे नटि जाय!!

थके नयन रघुपति छवि देखे।
पलकन्हि हु परिहरि निमेखे।।
अधिक सनेह देह भई भोरी।
सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।

Shringar Ras

राम के रूप निहारति जानकी कंकन के नग की परछाहीं । 
याती सबै सुधि भूलि गई, कर टेकि रही पल टारत नाहीं ।

वियोग श्रृंगार रस

जहां पर नायक-नायिका का परस्पर प्रबल प्रेम हो लेकिन मिलन न हो अर्थात नायक-नायिका के वियोग का वर्णन हो वहां पर वियोग रस होता है। 

वियोग श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति होता है

वियोग श्रृंगार रस का उदाहरण

उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
इन्द्री सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥

Shringar Ras


तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

 

पुनि वियोग सिंगार हूँ दीन्हौं है समुझाइ।
ताही को इन चारि बिधि बरनत हैं कबिराइ॥

इक पूरुब अनुराग अरु दूजो मान विसेखि।
तीजो है परवास अरु चौथो करुना लेखि॥

 

इन काहू सेयो नहीं पाय सेयती नाम।
आजु भाल बनि चहत तुव कुच सिव सेयो बाम॥

 

बेलि चली बिटपन मिली चपला घन तन माँहि।
कोऊ नहि छिति गगन मैं तिया रही तजि नाँहि॥

Shringar Ras

रस के भेद-
रस 9  प्रकार के होते हैं परन्तु वात्सल्य एवं भक्ति को भी रस माना गया हैं।

१- श्रंगार रस Shringar Ras 
२-  हास्य रस Hasya Ras
३-  वीर रस Veer Ras
४- करुण रस Karun Ras 
५-  शांत रस Shant Ras
६- अदभुत रस Adbhut Ras
७- भयानक रस Bhayanak Ras 
८- रौद्र रस Raudra Ras 
९- वीभत्स रस Vibhats Ras 
१०-  वात्सल्य रस Vatsalya Ras
११-  भक्ति रस Bhakti Ras

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Indian Industries And Manufacturing Sectors Hand Written PDF Notes Download

Indian Industries And Manufacturing Sectors Hand Written PDF
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इसे भी पढ़े…

 

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Book Name:Indian Industries And Manufacturing PDF
Size:1 MB
Total Number of Pages: 11 Page
Format: PDF
Quality Excellent
Language: Hindi
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Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा, भेद और उदाहरण

Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा
Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा

Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा, भेद और उदाहरण

उपसर्ग :

Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा, भेद और उदाहरण-उपसर्ग दो शब्दों से मिलकर बना होता है उप+सर्ग। उप का अर्थ होता है समीप और सर्ग का अर्थ होता है सृष्टि करना। संस्कृत एवं संस्कृत से उत्पन्न भाषाओँ में उस अव्यय या शब्द को उपसर्ग कहते है। अथार्त शब्दांश उसके आरम्भ में लगकर उसके अर्थ को बदल देते हैं या फिर उसमें विशेषता लाते हैं उन शब्दों को उपसर्ग कहते हैं। शब्दांश होने के कारण इनका कोई स्वतंत्र रूप से कोई महत्व नहीं माना जाता है।

जरुर पढ़े… 

Prefix In Hindi-उपसर्ग की परिभाषा, भेद और उदाहरण

परिभाषा : वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के पूर्व में लगकर नये शब्द का निर्माण करते हैं अर्थात् नये अर्थ का बोध कराते हैं , उन्हें उपसर्ग कहते हैं ।

ये शब्दांश होने के कारण वैसे इनका स्वतन्त्ररूप से अपना कोई महत्त्व नहीं होता किन्तु शब्द के पूर्व संश्लिष्ट अवस्था में लगकर उस शब्द विशेष के अर्थ में परिवर्तन ला देते हैं ।
जैसे ‘हार’ एक शब्द है , इसके साथ शब्दांश प्रयुक्त होने पर कई नये शब्द बनते हैं यथा आहार ( भोजन ) , उपहार ( भेंट ) प्रहार ( चोट ) विहार ( भ्रमण ) , परिहार ( त्यागना ) , प्रतिहार ( द्वारपाल ) संहार ( मारना ) , उद्धार ( मोक्ष ) आदि । अतः ‘हार’ शब्द के साथ प्रयुक्त क्रमशः आ , उप , प्र , वि , परि , प्रति , सम् , उत् शब्दांश उपसर्ग की श्रेणी में आते हैं ।

उपसर्ग के प्रकार

हिन्दी में उपसर्ग तीन प्रकार के होते हैं –
( i ) संस्कृत के उपसर्ग
( ii ) हिन्दी के उपसर्ग
( iii ) विदेशी उपसर्ग

( i ) संस्कृत के उपसर्ग

संस्कृत में उपसर्ग की संख्या 22 होती है । ये उपसर्ग हिन्दी में भी प्रयुक्त होते हैं इसलिए इन्हें संस्कृत के उपसर्ग कहते हैं ।

उपसर्गअर्थउपसर्गयुक्त शब्द
1.अतिअधिक / परेअतिशय , अतिक्रमण , अतिवृष्टि , अतिशीघ्र अत्यन्त , अत्यधिक , अत्याचार , अतीन्द्रिय अत्युक्ति , अत्युत्तम , अत्यावश्यक , अतीव
2 . अधिप्रधान / श्रेष्ठअधिकरण , अधिनियम , अधिनायक अधिकार , अधिमास , अधिपति , अधिकृत अध्यक्ष , अधीक्षण , अध्यादेश , अधीन अध्ययन , अधीक्षक , अध्यात्म , अध्यापक
3 . अनुपीछे / समानअनुकरण , अनुकूल , अनुचर , अनुज , अनुशासन , अनुरूप , अनुराग , अनुक्रम , अनुनाद , अनुभव , अनुशंसा , अन्वय , अन्वीक्षण , अन्वेषण , अनुच्छेद , अनूदित
4 . अपबुरा / विपरीतअपकार , अपमान , अपयश , अपशब्द अपकीर्ति , अपराध , अपव्यय , अपहरण , अपकर्ष , अपशकुन , अपेक्षा
5 . अभिपास / सामनेअभिनव , अभिनय , अभिवादन , अभिमान , अभिभाषण , अभियोग , अभिभूत , अभिभावक अभ्युदय , अभिषेक , अभ्यर्थी , अभीष्ट अभ्यन्तर , अभीप्सा , अभ्यास
6 . अवबुरा / हीनअवगुण , अवनति , अवधारण , अवज्ञा , अवगति , अवतार , अवसर , अवकाश , अवलोकन , अवशेष , अवतरण
7 . आतक / सेआजन्म , आहार , आयात , आतप , आजीवन , आगार , आगम , आमोद आशंका , आरक्षण , आमरण , आगमन आकर्षण , आबालवृद्ध , आघात
8 . उत्ऊपर / श्रेष्ठउत्पन्न , उत्पत्ति , उत्पीड़न , उत्कंठा उत्कर्ष , उत्तम , उत्कृष्ट , उदय , उन्नत , उल्लेख , उद्धार , उच्छ्वास उvuवल , उच्चारण , उच्छृखल , उद्गम
9 . उपपास / सहायकउपकार , उपवन , उपनाम , उपचार , उपहार , उपसर्ग , उपमन्त्री , उपयोग , उपभोग , उपभेद , उपयुक्त , उपभोग उपेक्षा , उपाधि , उपाध्यक्ष
10 . दुर्कठिन / बुरा / विपरीतदुराशा , दुराग्रह , दुराचार , दुरवस्था , दुरुपयोग , दुरभिसंधि , दुर्गुण , दुर्दशा दुर्घटना , दुर्भावना , दुरुह
11 . दुस्बुरा / विपरीत / कठिनदुश्चिन्त , दुश्शासन , दुष्कर , दुष्कर्म , दुस्साहस , दुस्साध्य ,
12 . निबिना / विशेषनिडर , निगम , निवास , निदान , नित्थ , निबन्ध , निदेशक , निकर , निवारण , न्यून , न्याय , न्यास , निषेध , निषिद्ध
13 . निर्बिना / बाहरनिरपराध , निराकार , निराहार , निरक्षर , निरादर , निरहंकार , निरामिष , निर्जर , निर्धन , निर्यात , निर्दोष , निरवलम्ब , नीरोग , नीरस , निरीह , निरीक्षण
14 . निराबिना / बाहरनिश्चय , निश्छल , निष्काम , निष्कर्म निष्पाप , निष्फल , निस्तेज , निस्सन्देह
15 . प्रआगे / अधिकप्रदान , प्रबल , प्रयोग , प्रचार , प्रसार , प्रहार , प्रयत्न , प्रभंजन , प्रपौत्र , प्रारम्भ , प्रोज्ज्वल , प्रेत , प्राचार्य , प्रायोजक , प्रार्थी
16 . पराविपरीत / पीछे / अधिकपराजय , पराभव , पराकम , परामर्श , परावर्तन , पराविद्या , पराकाष्ठा
17 . परिचारों ओर / पासपरिक्रमा , परिवार , परिपूर्ण , परिमार्जन , परिहार , परिक्रमण , परिभ्रमण , परिधान , परिहास , परिश्रम , परिवर्तन , परीक्षा , पर्याप्त , पर्यटन , परिणाम , परिमाण , पर्यावरण , परिच्छेद , पर्यन्त
18 . प्रतिप्रत्येक / विपरीतप्रतिदिन , प्रत्येक , प्रतिकूल , प्रतिहिंसा , प्रतिरूप , प्रतिध्वनि , प्रतिनिधि , प्रतीक्षा , प्रत्युत्तर , प्रत्याशा , प्रतीति
19 . विविशेष / भिन्नविजय , विज्ञान , विदेश , वियोग , विनाश , विपक्ष , विलय , विहार , विख्यात , विधान , व्यवहार , व्यर्थ , व्यायाम , व्यंजन , व्याधि , व्यसन , व्यूह
20 . सुअच्छा / सरलसुगन्ध , सुगति , सुबोध , सुयश , सुमन , सुलभ , सुशील , सुअवसर , स्वागत , स्वल्प , सूक्ति
21 . सम्अच्छी तरह / पूर्ण शुद्धसंकल्प , संचय , सन्तोष , संगठन , संचार , संलग्न , संयोग , संहार , संशय , संरक्षा
22 . अन्नहीं / बुराअनन्त , अनादि , अनेक , अनाहूत , अनुपयोगी , अनागत , अनिष्ट , अनीह अनुपयुक्त अनुपम , अनुचित , अनन्य

उपर्युक्त उपसर्गों के अतिरिक्त संस्कृत के निम्न उपसर्ग भी हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं

1 . अन्तर् – अन्तर्गत , अन्तरात्मा , अन्तर्धान , अन्तर्दशा अन्तर्राष्ट्रीय , अन्तरिक्ष , अन्तर्देशीय

2 . पुनर् – पुनर्जन्म , पुनरागमन , पुनरुदय , पुनर्विवाह पुनर्मूल्यांकन , पुनर्जागरण

3 . प्रादुर – प्रादुर्भाव , प्रादुर्भूत

4 . पूर्व – पूर्वज , पूर्वाग्रह , पूर्वार्द्ध , पूर्वाह्न पूर्वानुमान

5 . प्राक – प्राक्कथन , प्राक्कलन , प्रागैतिहासिक , प्राग्देवता , प्रामुख , प्राक्कर्म

6 . पुरस् – पुरस्कार , पुरश्चरण , पुरस्कृत

7 . बहिर् – बहिरागत , बहिर्जात , बहिर्भाव , बहिरंग , बहिर्गमन

8 . बहिस् – बहिष्कार , बहिष्कृत

9 . आत्म – आत्मकथा , आत्मघात , आत्मबल , आत्मचरित , आत्मज्ञान

10 . सह – सहपाठी , सहकर्मी , सहोदर , सहयोगी सहानुभूति , सहचर

11 . स्व – स्वतन्त्र , स्वदेश , स्वराज्य , स्वाधीन , स्वरचित , स्वनिर्मित , स्वार्थ

12 . पुरा – पुरातन , पुरातत्त्व , पुरापथ , पुराण , पुरावशेष

13 . स्वयं – स्वयंभू , स्वयंवर , स्वयंसेवक , स्वयंपाणि , स्वयंसिद्ध

14 . आविस् – आविष्कार , आविष्कृत

15 . आविर् – आविर्भाव , आविर्भूत

16 . प्रातर् – प्रातः काल , प्रातः वन्दना , प्रातः स्मरणीय

17 . इति – इतिश्री , इतिहास , इत्यादि , इतिवृत्त

18 . अलम् – अलंकरण , अलंकृत , अलंकार

19 . तिरस् – तिरस्कार , तिरस्कृत

20 . तत् – तल्लीन , तन्मय , तद्धित , तदनन्तर , तत्काल , तत्सम , तद्भव , तद्रूप

27 . अमा – अमावस्या , अमात्य

22 . सत् – सत्कर्म , सकार , सद्गति , सज्जन , सच्चरित्र , सद्धर्म , सदाचार

( ii ) हिन्दी के उपसर्ग

1 . अन – ( नहीं ) अनपढ़ , अनजान , अनबन , अनमोल अनहोनी , अनदेखी , अनचाहा , अनसुना

2 . अध – ( आधा ) अधमरा , अधपका , अधजला , अधगला , अधकचरा , अधखिला , अधनंगा

3 . उ – उचक्का , उजड़ना , उछलना , उखाड़ना , उतावला

4 . उन – ( एक कम ) उन्नीस , उनतीस , उनचालीस , उनचास उनसठ , उन्नासी

5 . औ – ( अब ) औगुन , औगढ़ , औसर , औघट , औतार

6 . कु – ( बुरा ) कुरूप , कुपुत्र , कुकर्म , कुख्यात , कुमार्ग कुचाल , कुचक्र , कुरीति

7 . चौ – ( चार ) चौराहा , चौमासा , चौपाया , चौरंगा , चौकन्ना , चौमुखा , चौपाल

8 . पच – ( पॉच ) पचरंगा , पचमेल , पचफूटा , पचमढ़ी

9 . पर – ( दूसरा ) परहित , परदेसी , परजीवी , परकोटा , परदादा , परलोक , परकाज , परोपकार

10 . भर – ( पूरा ) भरपेट , भरपूर , मरकम , भरसक , भरमार , भरपाई

11 . बिन – ( बिना ) बिनखाया , बिनब्याहा बिनबोया बिन माँगा , बिन बुलाया , बिनजाया

12 . ति – ( तीन ) तिरंगा , तिराहा , तिपाई , तिकोन , तिमाही

13 . दु – ( दो / बुरा ) दुरंगा , दुलत्ती , दुनाली , दुराहा दुपहरी , दुगुना , दुकाल , दुबला

14 . का – ( बुरा ) कायर , कापुरुष , काजल

15 . स – ( सहित ) सपूत , सफल , सबल , सगुण , सजीव , सावधान , सकर्मक

16 . चिर – ( सदैव ) चिरकाल , चिरायु , चिरयौवन , चिरपरिचित चिरस्थायी , चिरस्मरणीय , चिरप्रतीक्षित

17 . न – ( नहीं ) नकुल , नास्तिक , नग , नपुंसक , नगण्य , नेति

18 . बहु – ( ज्यादा ) बहुमूल्य , बहुवचन , बहुमत , बहुभुज ,बहुविवाह , बहुसंख्यक , बहूपयोगी

19 . आप – ( स्वयं ) आपकाज , आपबीती , आपकही , आपसुनी

20 . नाना – ( विविध ) नानाप्रकार , नानारूप , नानाजाति , नानाविकार

21 . क – ( बुरा ) कपूत , कलंक , कठोर

22 . सम – ( समान ) समतल , समदर्शी , समकोण , समकक्ष , समकालीन , समचतुर्भुज , समग्र

( iii ) विदेशी उपसर्ग

हिन्दी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी प्रयुक्त होते हैं फलतः उनके उपसर्गों को हिन्दी में विदेशी उपसर्ग की संज्ञा दी जाती है ।

1 . बेरहितबेघर , बेवफा , बेदर्द , बेसमझ , बेवजह , बेहया , बेहिसाब
2 . दरमेंदरअसल , दरबार , दरखास्त , दरहकीकत , दरम्यान
3 . बासहितबाइज्जत , बामुलायजा , बाअदब , बाकायदा
4 . कम्अल्पकमअक्ल , कमउम्र , कमजोर , कम समझ , कमबख्त
5 . लापरे / बिनालाइलाज , लावारिस , लापरवाह , लापता , लाजवाब
6 . नानहींनापसन्द , नाकाम , नाबालिग , नाजायज , नालायक , नाराज , नादान
7 . हरप्रत्येकहरदम , हरवक्त , हररोज , हरहाल हर मुकाम , हर घड़ी
8 . खुशश्रेष्ठखुशनुमा , खुशहाल , खुशबू , खुशखबरी खुशमिजाज
9 . बदबुराबदबू , बदचलन , बदमाश , बदमिजाज , बदनाम , बदकिस्मत
10 . सरमुख्य / प्रधानसरपंच , सरदार , सरताज , सरकार
11 . बसहितबखूबी , बतौर , बशर्त , बदौलत
12 . बिलाबिनाबिलाकसूर , बिलावजह , बिलाकानून
13 . बेशअत्यधिकबेश कीमती , बेश कीमत
14 . नेकभलानेकराह , नेकनाम , नेकदिल , नेकनीयत
15 . ऐनठीकऐनवक्त , ऐनजगह , ऐन मौके
16 . हमसाथहमराज , हमदम , हमवतन , हमसफर , हमदर्द
17 . अलनिश्चितअलगरज , अलविदा , अलबत्ता , अलबेता
18 . गैररहित भिन्नगैर हाजिर , गैरमर्द , गैर वाजिब
19 . हैडप्रमुखहैडमास्टर , हैड ऑफिस , हैडबॉय
20 . हाफआधाहाफकमीज , हाफटिकट , हाफपेन्ट , हाफशर्ट
21 . सबउपसब रजिस्ट्रार , सबकमेटी , सब इन्स्पेक्टर
22 . कोसहितको – आपरेटिव , को – आपरेशन , को – एजूकेशन

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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली

भारतीय रिज़र्व बैंक Reserve Bank of India
भारतीय रिज़र्व बैंक Reserve Bank of India

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली-Hello Friends, wikimeinpedia.com पर आपका स्वागत है,जैसा की आप सभी जानते हैं की हम आप सभी छात्र-छात्राओं  लिए प्रतिदिन Competitive exams से सम्बंधित जानकारियां शेयर करते हैं| दोस्तों आज हम आप सभी छात्रों के लिए एक बार फिर से Economics Notes की बहुत ही महत्वपूर्ण PDF Notes शेयर कर रहे हैं जिसका नाम भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली ” है| इसमें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के उन सभी points को बहुत ही बेहतर तरीके से focus गया है जो UPSC, IAS, State PCS, SSC आदि exam में पूछे जाते है इसका pdf format download करके आप पढ़ सकते है यह हमारी Hindi भाषा में दिया गया है।

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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंकिंग प्रणाली – भारतीय बैंकिंग प्रणाली को भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India / RBI) नियन्त्रित करती है। यहाँ पर बैंकिंग प्रणाली के विकास के विभिन्न सोपानों की जानकारी दी गई है।

  • बैंक ऑफ़ हिन्दुस्तान भारत का पहला बैंक था, इसकी स्थापना कोलकाता में एलेक्जेंडर एण्ड कम्पनी द्वारा 1770 ई. में यूरोपीय पद्धति में की गई थी।
  • भारतीयों द्वारा संचालित सीमित देयता के आधार पर भारत का प्रथम बैंक, अवध कॉमर्शियल बैंक (1881) तथा पूर्ण स्वामित्व वाला प्रथम भारतीय बैंक पंजाब नेशनल बैंक ( Punjab National Bank / PNB ) (1894) था।
  • बैंक ऑफ़ बंगाल की 2 जून 1806 को, बैंक ऑफ़ बॉम्बे की 15 अप्रैल 1840 को तथा बैंक ऑफ़ मद्रास की 1 जुलाई 1843 को स्थापना हुई। बाद में, 27 जनवरी 1921 को इन तीनों बैंकों को मिलाकर एक एकल बैंक ‘इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया’ की स्थापना की गयी।
  • इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इण्डिया ( Imperial Bank of India / IBI ), भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना व बड़ा व्यावसायिक ( Commercial ) बैंक था। जिसे 1 जुलाई 1955 को राष्ट्रीयकरण के बाद से भारतीय स्टेट बैंक (state bank of India) के नाम से जान गया।
  • स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीयकरण के समय इसके 8 सहयोगी बैंकों का भी राष्ट्रीयकरण किया गया था, परन्तु सरकार ने बाद में स्टेट बैंक ऑफ़ इंदौर तथा स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र का विलय स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में कर दिया।
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स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सहयोगी बैंक –

स्टेट बैंक ऑफ़ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ़ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर एंड जयपुर।

भारतीय महिला बैंक –

सरकार ने महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिये 5 अगस्त 2013 को भारतीय महिला बैंक की स्थापना की। इसकी प्रथम चैयरमैन सह-प्रबन्ध निदेशक उषा अनन्त सुब्रह्मण्यम को नियुक्त किया गया तथा इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।

भारतीय रिज़र्व बैंक –

  • 1 अप्रैल 1935 को 5 करोड़ की अधिकृत पूँजी से भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई तथा 1 जनवरी 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण किया गया।
  • सिक्कों का मुद्रण भारत सरकार करती है जबकि 5, 10, 20, 50, 100, 500 तथा 2000 के नोट रिज़र्व बैंक छापता है।
  • भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर दो रुपये या उससे अधिक के नोट पर होते है जबकि एक रुपये के नोट पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते है।
  • रिज़र्व बैंक द्वारा 19 अगस्त 1944 को रुपये को भुगतान सन्तुलन में सुधार हेतु चालू खाते में पूर्ण परिवर्तनीय घोषित कर दिया गया।
  • भारत का वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च तक होता है।

भारतीय रिज़र्व बैंक के मुख्य कार्य –

  1. भारत सरकार का बैंकर
  2. बैंकों का बैंक
  3. नोट निर्गमन
  4. विदेशी विनिमय नियन्त्रण
  5. साख नियन्त्रण
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बैंकों का राष्ट्रीयकरण –

  • 19 जुलाई 1969 को ऐसे 14 बड़े व्यावसायिक बैंक जिनकी जमा पूँजी ₹ 50 करोड़ से अधिक थी, का राष्ट्रीयकरण किया गया।
  • बाद में, 15 अप्रैल 1980 को ₹ 200 करोड़ से अधिक जमा पूँजी वाले 6 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।
  • वर्तमान में राष्ट्रीयकृत बैंकों की कुल संख्या 21 है।

भारत में कार्यरत प्रमुख निजी बैंक –

  1. ICICI बैंक
  2. IDBI बैंक
  3. HDFC बैंक
  4. इंडसलैंड बैंक
  5. ग्लोबल ट्रस्ट बैंक
  6. टाइम्स बैंक
  7. सेन्चुरियन बैंक

प्रमुख बैंकों का विलय –

बैंक ( जिसका विलय हुआ )बैंक ( जिसमें विलय हुआ )
न्यू बैंक ऑफ़ इण्डियापंजाब नेशनल बैंक
देना बैंक ( कजाखस्तान )पंजाब नेशनल बैंक
स्टेट बैंक ऑफ़ इन्दौरभारतीय स्टेट बैंक
स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्रभारतीय स्टेट बैंक
बैंक ऑफ़ राजस्थानICICI बैंक
रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंडHSBC बैंक
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