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शिक्षा मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धांत व प्रतिपादक|Shiksha Manovigyan Ke Pratipadak

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शिक्षा मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धांत व प्रतिपादक|Shiksha Manovigyan Ke Pratipadak
शिक्षा मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धांत व प्रतिपादक|Shiksha Manovigyan Ke Pratipadak

शिक्षा मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धांत व प्रतिपादक. Shiksha Manovigyan Ke Pratipadak

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शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology) :

मनोविज्ञान सीखने से सम्बंधित मानव विकास के कैसेसीखा जाए की व्याख्या करती है, शिक्षा सीखने के क्यासिखा जाए को प्रदान करने की चेष्टा करती है।
क्रो  क्रो

मनोविज्ञान मानव व्यवहार का अध्ययन करता है और शिक्षा मानव व्यवहार में परिवर्तन करती है, अतः शिक्षा और मनोविज्ञान में गहन सम्बन्ध है।
 

शिक्षा क्या है? 


शिक्षा शब्द संस्कृत के शिक्ष् धातु से बना है, जिसका अर्थ है : 

सीखना अंग्रेजी शब्द एजुकेशन (Education)लैटिन भाषा के एडुकेयर (Educare) एवं एडुसीयर(Educere)  से बना है, जिसका अर्थ है नेतृत्व देना,बाहर लाना

शिक्षा का अर्थ :


(A). संकुचित सन्दर्भ में (प्राचीन दृष्टिकोण) :
1. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध (1879) तक
2. औपचारिक शिक्षा (किताबी ज्ञान)
3. शिक्षा विद्यालय तक सीमित
4. ज्ञानात्मक पक्ष पर बल
5. सैद्धान्तिक पक्ष पर बल
(B). व्यापक सन्दर्भ में (नवीन दृष्टिकोण) : 
1. 1879 से अब तक (20वीं सदी)
2. अनौपचारिक शिक्षा
3. शिक्षा जीवन पर्यन्त
4. सर्वांगीण विकास पर बल
5. व्यावहारिक पक्ष पर बल

मनोविज्ञान क्या है?


मनोविज्ञान के अंग्रेजी पर्याय साइकोलॉजी (Psychology) शब्द की उत्पत्ति यूनानी (ग्रीक) भाषा के साइकी (Psyche) और लोगस(Logos) से हुई है। साइकी का अर्थ है आत्मा और लोगस का अर्थहै अध्ययन अतः मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ है आत्मा काअध्ययन

अमरीकी विद्वान विलियम जेम्स (1842-1910) ने मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र के शिकंजे से मुक्त कर एक स्वतंत्र विद्या का रूप दिया। इसलिए इन्हे मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
 

मनोविज्ञान की उत्पत्ति


मनोविज्ञान की उत्पत्ति दर्शनशास्त्र के अंग के रूप में हुई। कालान्तर में मनोविज्ञान के अर्थ में परिवर्तन होता गया। जो इस प्रकार है :
1. आत्मा का विज्ञान : अरस्तू, प्लेटो,अरिस्टोटल और डेकोर्टे  आदि यूनानी दार्शनिको ने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना, किन्तु आत्मा की प्रकृति की अस्पष्टता के कारण 16वीं शताब्दी में मनोविज्ञान का यह अर्थ अस्वीकृत कर दिया गया।

TRICK-आत्मा से आप यू अड़े
1. आत्मा सेइन सभी दार्शनिको ने मनोविज्ञान को आत्मा काविज्ञान माना
2. अरस्तू (दार्शनिक)
3.
 प्लेटो (दार्शनिक)
4.
 यूयूनानी दार्शनिक थे सभी
5. अरिस्टोटल (दार्शनिक)
6.
 डेडेकार्टे (दार्शनिक)
 

मस्तिष्क का विज्ञान 


मस्तिष्क का विज्ञान : 17वीं शताब्दी में दर्शनीको ने मनोविज्ञान को मन या मस्तिष्क का विज्ञान कहा। इनमेइटली के प्रसिद्ध दार्शनिकपॉम्पोनॉजी के अलावा लॉक और बर्कली भी प्रमुख है। कोई भी विद्वान मन की प्रकृति तथा स्वरुप का निर्धारण नही कर सका, अतः यह परिभाषा भी मान्यता नही पा सकी।

TRICK-पलक की बाई मस्ति में
1. पॉम्पोनॉजी (दार्शनिक)
2.
 लकलॉक (दार्शनिक)
कीsilent
3. बाबर्कली (दार्शनिक)
4.
 इटलीयह इटली के प्रसिद्ध दार्शनिक थे
5. मस्तिइन सभी दार्शनिको ने मनोविज्ञान को मस्तिष्क का विज्ञानमाना
 

 चेतना का विज्ञान 


चेतना का विज्ञान : 19वीं शताब्दी के मनोविज्ञानकों विलियम वुन्ट,विलियम जेम्स, वाइव्स और जेम्स सल्लीआदि ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना। इनका मानना था, कि मनोविज्ञान मनुष्य की चेतन क्रियाओ का अध्ययन करता है।
मनोविज्ञान केवल चेतन मन का ही नही, बल्कि अचेतन और अवचेतन आदि प्रक्रियाओ का अध्ययन भी करता है। मनोविज्ञान का यह अर्थ सीमित होने के कारण सर्वमान्य न हो सका। मैक्डूगल ने अपनीपुस्तक आउटलाइन साइकोलॉजी में चेतना शब्द की कड़ीआलोचना की।

TRICK-चेतना को विलियम ने सजवाइ
1. चेतनाइन सभी दार्शनिको ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञानमाना
कोsilent
2. विलियमविलियम वुन्ट
नेsilent
3. सल्ली अर्थात जेम्स सल्ली (दार्शनिक)
4.
 जेम्स अर्थात विलियम जेम्स (दार्शनिक)
5.
 वाइवाइव्स (दार्शनिक)
 

व्यवहार का विज्ञान 


व्यवहार का विज्ञान : 20वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में मनोविज्ञान के अनेक अर्थ सुझाए गए, इनमे से “मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है।” अर्थ सर्वाधिक मान्य रहा। इस सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्नलिखित है :
1. वाटसन : मनोविज्ञान, व्यवहार का निश्चित विज्ञान है।
2. वुडवर्थ : मनोविज्ञान वातावरण के सम्बन्ध में व्यक्ति की क्रियाओ का वैज्ञानिक अध्ययन है।
3. स्किनर : मनोविज्ञान, जीवन की सभी प्रकार की परिस्थितियों में प्राणी की प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। or
मनोविज्ञान, व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।

4. मन : आधुनिक मनोविज्ञान का सम्बन्ध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज से है।
5. क्रो  क्रो : मनोविज्ञान मानव व्यवहार और मानव सम्बन्धो का अध्ययन है।
6. मैक्डूगल : मनोविज्ञान जीवित वस्तुओ के व्यवहार का विधायक विज्ञान है।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर हम वुडवर्थ के शब्दों में इस निष्कर्ष पर पहुँचते है :
सबसे पहले मनोविज्ञान ने अपनी आत्मा का त्याग किया। फिरउसने अपने मन या मस्तिष्क का त्याग किया। उसके बाद उसनेचेतना का त्याग किया। अब वह व्यवहार की विधि को स्वीकारकरता है।

TRICK-सिवम (शिवम) व्यवहार में वुड (लकड़ी/wood सा कठौर)के जैसा
1. सिस्किनर (दार्शनिक)
2.
 वाटसन (दार्शनिक)
3.
 मन (दार्शनिक)
4.
 व्यवहारइन सभी ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना
5. मेंमैक्डूगल (दार्शनिक)
6.
 वुडवुडवर्थ (दार्शनिक)
7.
 केक्रो  क्रो (दार्शनिक)
जैसाsilent
 

शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ है : 


शिक्षा सम्बन्धी मनोविज्ञान अर्थात यह शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। शिक्षा मनोविज्ञान के अर्थ का विश्लेषण करने के लिए स्किनर ने निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किए है :
1. शिक्षा मनोविज्ञान का केंद्र मानव व्यवहार है।
2. शिक्षा मनोविज्ञान खोज और निरिक्षण से प्राप्त तथ्यों का संग्रह करता है।
3. शिक्षा मनोविज्ञान संगृहीत ज्ञान को सिद्धान्त रूप देता है।
4. शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा की समस्याओ के समाधान के लिए पद्धतियों का प्रतिपादन करता है।
 

शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषाएँ :


1. स्किनर : शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत शिक्षा से सम्बन्धित सम्पूर्ण व्यवहार और व्यक्तित्व आ जाता है।
2. क्रो  क्रो : शिक्षा मनोविज्ञान, व्यक्ति के जन्म से वृद्धावस्था तक सिखाने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।
3. कॉलसनिक : शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों और अनुसन्धान का शिक्षा में प्रयोग है।
4. स्टीफन : शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक विकास का क्रमिक अध्ययन है।
5. सॉरे  टेलफ़ोर्ड : शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य सम्बन्ध सिखने से है। यह मनोविज्ञान का वह अंग है, जो शिक्षा  के मनोवैज्ञानिक पहलुओ की वैज्ञानिक खोज से विशेष रूप से सम्बन्धित है।
 
उपर्युक्त  परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है, की :
1. शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार का अध्ययन करता है।
2. शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया को अधिक सरल व सुगम बनाता है।
3. शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है, क्योंकि इसके अध्ययन में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग होता है।
4. शिक्षा मनोविज्ञान में मनोविज्ञान के सिद्धांतो व विधियों का प्रयोग होता है।
 

शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्य :


स्किनर ने शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्यों को दो भागो में विभाजितकिया है
1. सामान्य उद्देश्य : 
(i). सिद्धांतो की खोज तथा तथ्यों का संग्रह करना।
(ii). बालक के व्यक्तित्व का विकास करना।
(iii). शिक्षण कार्य में सहायता देना।
(iv). शिक्षण विधि में सुधार करना।
(v). शिक्षा के उद्देश्य व लक्ष्यों की पूर्ति करना।

2. विशिष्ट उद्देश्य : 
(i). बालको के प्रति निष्पक्ष व सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण।
(ii). शिक्षा के स्तरों व उद्देश्यों को निश्चित करना।
(iii). शिक्षण परिणाम जानने में सहायता करना।
(iv). छात्र व्यवहार को समझने में सहायता देना।
(v). शिक्षण समस्या के समाधान हेतु सिद्धांतो का ज्ञान।
 

शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र :


शिक्षा मनोविज्ञान एक नवीन एवं विकासशील व्यावहारिक विज्ञान है। इसलिए शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र की सीमाएँ अभी निर्धारित नही हो सकी है।

शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा का वह विज्ञान है जो शिक्षण-अधिगम समस्याओं का अध्ययन करके सीखने वाले के व्यवहार में वांछित परिवर्तन है तथा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करने के लिए शिक्षक के कार्य में सहायता देता है। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में निम्नलिखित अध्ययन सामग्री को सम्मिलित किया गया है-
1. बालक की विशेष योग्यताओं का अध्ययन।
2. बालक के वंशानुक्रम और वातावरण का अध्ययन।
3. बालक के विकास की अवस्थाओं का अध्ययन।
4. बालक की रूचि व अरुचि का अध्ययन।
5. बालक की मूल प्रवत्तियों का अध्ययन।

6. बालक के सर्वांगीण विकास का अध्ययन।
7. अपराधी, असामान्य और मंद बुद्धि बालकों का अध्ययन।
8. शिक्षण विधियों के उपयोग सम्बन्धी अध्ययन।
9. शिक्षा के उद्देश्यों व उनको प्राप्त करने के तरीकों का अध्ययन।
10. अनुशासन सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन।

11. पाठ्यक्रम निर्माण से सम्बन्धित अध्ययन।
12. शिक्षा की समस्याओं का अध्ययन।
13. सीखने की क्रियाओं का अध्ययन।

निष्कर्ष रूप में स्किनर का कथन द्रष्टव्य है शिक्षा मनोविज्ञान केक्षेत्र में वह सब ज्ञान और विधियाँ सम्मिलित है, जो सीखने कीप्रक्रिया से अधिक अच्छी  प्रकार समझने और अधिक कुशलता सेनिर्देशित करने के लिए आवश्यक है।
 

शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :


हुए शिक्षा देनी चाहिए। यह तभी संभव होगा जब शिक्षक को शिक्षा मनोविज्ञान की जानकारी होगी।
शिक्षण का मुख्य केंद्र बालक है। बालक की रूचि, शारीरिक क्षमता, बौद्धिक क्षमता, व्यक्तित्व आदि को मद्देनजर रखते
स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी कीआधारशिला है।
अतः शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की निम्नलिखित उपयोगिताएँ है-
1. स्वयं की योग्यता का ज्ञान एवं तैयारी।
2. बाल विकास की अवस्थाओं का ज्ञान।
3. बाल स्वभाव व व्यवहार का ज्ञान।
4. बालको की क्षमता व रूचि का ज्ञान।
5. बालको की अवश्यक्ताओ का ज्ञान।

6. बालको के चरित्र निर्माण में सहायक।
7. बालको की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ज्ञान।
8. बालको के सर्वांगीण विकास में सहायक।
9. बालको की मूल प्रवत्तियो का ज्ञान।
10. कक्षा की समस्याओ का समाधान।

11. अनुशासन में सहायक।
12. उपयोगी पाठ्यक्रम के निर्माण में सहायक।
13. यथोचित शिक्षण विधियों के प्रयोग का ज्ञान।
14. मूल्यांकन की नई विधियों का प्रयोग।
इस प्रकार मनोविज्ञान का ज्ञान ही शिक्षक की सफलता का रहस्य है। इस ज्ञान की प्राप्ति के बिना उसे असफलता और अकुशलता के बीच अपने व्यावसायिक जीवन की यात्रा करनी पड़ती है। इसलिए शिक्षक अपने कर्त्तव्यों और दायित्वों का पालन करने में हर समय मनोविज्ञान से सहायता और मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
 

शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का योगदान :


1. मनोविज्ञान ने शिक्षा को बालकेंद्रित बनाकर बालक को महत्त्व दिया।
2. बालको की विभिन्न अवस्थाओ के अनुरूप शिक्षण विधियों की व्यवस्था की।
3. बालको की रुचियों व मूल प्रवत्तियो को शिक्षा का आधार बनाया।
4. बालको की व्यक्तिगत विभिन्नताओं के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था की।

5. पाठ्यक्रम का निर्माण बालको की आयु, रूचि व स्तरानुसार किया जाने लगा।
6. पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओ पर बल दिया गया।
7. दण्ड के स्थान पर प्रेम व सहानुभूति को अनुशासन का आधार बनाया।
8. शिक्षक को शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हुई या नही, की जानकारी देता है।
9. मूल्यांकन के लिए नवीन विधियों की खोज की।
 

मनोविज्ञान के महत्त्वपूर्ण तथ्य 


1. मनोविज्ञान का जन्म अरस्तू के समय दर्शनशास्त्र के अंग के रूप में हुआ।
2. वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार का शुद्ध विज्ञान माना है।
3. विलियम जेम्स को मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

4. जर्मनी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम वुन्ट ने 1879 . मेंलिपजिंग में प्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना करके मनोविज्ञान को वैज्ञानिक स्वरुप दिया।
5. वॉल्फ ने शक्ति मनोविज्ञान का प्रतिपादन किया।
6. आधुनिक शिक्षा के जनक माने जाते हैजे..स्टिपर
 
 
स्मरणीय बिंदु :
1. वाटसन को व्यवहारवादी मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
2. रूसो ने शिक्षा में मनोविज्ञानिक दृष्टिकोण की शुरुआत की।
3. मनोविज्ञान की शाखा के रूप में शिक्षा मनोविज्ञान का जन्म 1900. में हुआ।
4. मनोविज्ञान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

5. मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान (Positive Science) है।
6. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जन्मदाता विलियम वुन्ट थे।
7. कॉलसनिक शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ प्लेटो से मानते है।
9. स्किनर शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ अरस्तू से मानते है।
 

शिक्षा मनोविज्ञान : व्यक्तित्व


व्यक्तित्व अंग्रेजी के पर्सनेल्टी (Personality) का पर्याय है। पर्सनेल्टी शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के पर्सोनाशब्द से हुई है, जिसका अर्थ है मुखोटा (Mask)’। उस समय व्यक्तित्व का तात्पर्य बाह्य गुणों से लगाया जाता था। यह धारणा व्यक्तित्व के पूर्ण अर्थ की व्याख्या नही करती। व्यक्तित्व की कुछ आधुनिक परिभाषाएँ दृष्टव्य है :
 
1. गिलफोर्ड : व्यक्तित्व गुणों का समन्वित रूप है।
2. वुडवर्थ : व्यक्तित के व्यवहार की एक समग्र विशेषता ही व्यक्तित्व है।
3. मार्टन : व्यक्तित्व व्यक्ति के जन्मजात तथा अर्जित स्वभाव, मूल प्रवृत्तियों, भावनाओं तथा इच्छाओं आदि का समुदाय है।
4. बिग एवं हंट : व्यक्तित्व व्यवहार प्रवृत्तियों का एक समग्र रूप है, जो व्यक्तित के सामाजिक समायोजन में अभिव्यक्त होता है।
5. ऑलपोर्ट (Imp) : व्यक्तित्व का सम्बन्ध मनुष्य की उन शारीरिक तथा आन्तरिक वृत्तियों से है, जिनके आधार पर व्यक्ति अपने वातावरण के साथ समायोजन स्थापित करता है।
इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते है, कि व्यक्तित्व एक व्यक्ति के समस्त मानसिक एवं शारीरिक गुणों का ऐसा गतिशील संगठन है, जो वातावरण के साथ उस व्यक्ति का समायोजन निर्धारित करता है।
 

व्यक्तित्व मापन के सिद्धांत 


TRICK-विकट में जागो आम व्यक्ति हमें माँगना है मन से औरशरीर से
Note : शब्दो  का विग्रह/विच्छेद करने पर पहला शब्द व्यक्तित्व मापन के सिद्धान्त का नाम तथा दूसरा शब्द उस सिद्धान्त के प्रतिपादक/प्रवर्तक/मनोवैज्ञानिक का नाम है।
 
ट्रिक का विस्तृत्व रुप :
1. वि+कट = विशेषक सिद्धान्तकैटल
मेंsilent
2. जा+गो = जिव सिद्धांतगोल्डस्टीन
3. + = आत्मज्ञान का सिद्धान्तमास्लो
4. व्यक्ति = व्यक्ति अर्थात यह ट्रिक्स व्यक्तित्व मापन  के सिद्धान्तकी है।

5. +में = हार्मिक सिद्धान्तमैक्डूगल
6. माँगना+है = माँग सिद्धान्तहेनरी मुरे
7. मन+से = मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्तसिंगमंड फ्रायड
औरsilent
8. शरीर+से = शरीर रचना सिद्धान्तशैल्डन
 

व्यक्तित्व के प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार है


1. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त : इस सिद्धान्त का प्रतिपादन फ्रायड ने किया था। उनके अनुसार व्यक्तित्व के तीन अंग है-
(i). इदम् (Id)
(ii). 
अहम् (Ego)
(iii). 
परम अहम् (Super Ego)
ये तीनो घटक सुसंगठित कार्य करते है, तो व्यक्ति समायोजित कहा जाता है। इनसे संघर्ष की स्थिति होने पर व्यक्ति असमायोजित हो जाता है।

(i). इदम् (Id) : यह जन्मजात प्रकृति है। इसमें वासनाएँ और दमित इच्छाएँ होती है। यह तत्काल सुख व संतुष्टि पाना चाहता है। यह पूर्णतः अचेतन में कार्य करता है। यह पाश्विकता का प्रतीक है।
(ii). अहम् (Ego) : यह सामाजिक मान्यताओं व परम्पराओं के अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा देता है। यह संस्कार, आदर्श, त्याग और बलिदान के लिए तैयार करता है। यह देवत्व का प्रतीक है।
(iii). परम अहम् (Super Ego) : यह इदम् और परम अहम् के बीच संघर्ष में मध्यस्थता करते हुए इन्हे जीवन की वास्तविकता से जोड़ता है अहम् मानवता का प्रतीक है, जिसका सम्बन्ध वास्तविक जगत से है। जिसमे अहम् दृढ़ व क्रियाशील होता है, वह व्यक्ति समायोजन में सफल रहता है। इस प्रकार व्यक्तित्व इन तीनों घटकों के मध्यसमायोजन कापरिणाम है।
 

शरीर रचना सिद्धान्त


शरीर रचना सिद्धान्त : इस सिद्धान्त के प्रवर्तक शैल्डन थे। इन्होंने शारीरिक गठन व शरीर रचना के आधार पर व्यक्तित्व की व्याख्या करने का प्रयास किया। यह शरीर रचना व व्यक्तित्व के गुणों के बीच घनिष्ठ संबंध मानते हैं। इन्होंने शारीरिक गठन के आधार पर व्यक्तियों को तीन भागों- गोलाकृति, आयताकृति, और लंबाकृति में विभक्त किया। गोलाकृति वाले प्रायः भोजन प्रिय, आराम पसंद, शौकीन मिजाज, परंपरावादी, सहनशील, सामाजिक तथा हँसमुख प्रकृति के होते हैं। आयताकृति वाले प्रायः रोमांचप्रिय, प्रभुत्ववादी, जोशीले, उद्देश्य केंद्रित तथा क्रोधी प्रकृति के होते हैं। लम्बाकृति वाले प्रायः गुमसुम, एकांतप्रिय अल्पनिद्रा वाले, एकाकी, जल्दी थक जाने वाले तथा निष्ठुर प्रकृति के होते हैं।
 

विशेषक सिद्धान्त


. विशेषक सिद्धान्त : इस सिद्धान्त का प्रतिपादन कैटल ने किया था। उसने कारक विश्लेषण नाम की सांख्यिकीय प्रविधि का उपयोग करके व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाले कुछ सामान्य गुण खोजे, जिन्हें व्यक्तित्व विशेषकनाम दिया। इसके कुछ कारक है- धनात्मकचरित्र, संवेगात्मक स्थिरता, सामाजिकता, बृद्धि आदि।
कैटल के अनुसार व्यक्तित्व वह विशेषता है, जिसके आधार पर विशेष परिस्थिति में व्यक्तित के व्यवहार का अनुमान लगाया जाता है। व्यक्तित्व विशेषक मानसिक रचनाएँ है। इन्हे व्यक्ति के व्यवहार प्रक्रिया की निरंतरता व नियमितता के द्वारा जाना जा सकता है।
 

माँग सिद्धान्त


माँग सिद्धान्त : इस सिद्धांत के प्रतिपादक हेनरी मुझे मानते हैं कि मानव एक प्रेरित जीव है जो अपने अंतर्निहित आवश्यकताओं तथा दबावों के कारण जीवन में उत्पन्न तनाव को कम करने का निरंतर प्रयास करता रहता है। वातावरण व्यक्ति के अंदर कुछ माँगो को उत्पन्न करता है। यह माँगे ही व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले व्यवहार को निर्धारित करती है। मुरे ने व्यक्तित्व माँग की 40 माँगे ज्ञात की।
 

शिक्षा मनोविज्ञान : व्यक्तित्व के प्रकार 


1. कैचमर का शरीर रचना पर आधारित वर्गीकरण :
(i). शक्तिहीन (एस्थेनिक)
(ii). खिलाड़ी (एथलेटिक)
(iii). नाटा (पिकनिक)।
 
2. कपिल मुनि का स्वभाव पर आधारित वर्गीकरण :
(i). सत्व प्रधान व्यक्ति
(ii). राजस प्रधान व्यक्ति
(iii). तमस प्रधान व्यक्ति।
 
3. थार्नडाइक का चिंतन पर आधारित वर्गीकरण :
(i). सूक्ष्म विचारक
(ii). प्रत्यक्ष विचारक
(iii). स्थूल विचारक।
 
4. स्प्रेंगर का समाज सम्बंधित वर्गीकरण :
(i). वैचारिक
(ii). आर्थिक
(iii). सौंदर्यात्मक
(iv). राजनैतिक
(v). धार्मिक
(vi). सामाजिक।
5. जुंग द्वारा किया गया मनोवैज्ञानिक वर्गीकरण :
वर्तमान में जुंग का वर्गीकरण सर्वोत्तम माना जाता है। इन्होंने मनोवैज्ञानिक लक्षणों के आधार पर व्यक्तित्व के तीन भेद माने जाते है-
(i). अन्तर्मुखीअंतर्मुखी झेंपने वाले, आदर्शवादी और संकोची स्वभाव वाले होते है। इसी स्वभाव के कारण वे अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असफल रहते है। ये बोलना और मिलना कम पसंद करते है। पढ़ने में अधिक रूचि लेते है। इनकी कार्य क्षमता भी अधिक होती है।
(ii). बहिर्मुखीबहिर्मुखी व्यक्ति भौतिक और सामाजिक कार्यो में विशेष रूचि लेते है। ये मेलजोल बढ़ाने वाले और वाचाल होते हैं। ये अपने विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकते हैं। इनमे आत्मविश्वास चरम सीमा पर होता है और बाह्य सामंजस्य के प्रति सचेत रहते है।
(iii). उभयमुखीइस प्रकार के व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में बहिर्मुखी तथा कुछ में अंतर्मुखी होते है। जैसे एक व्यक्ति अच्छा बोलने वाला और लिखने वाला है, किन्तु एकांत में कार्य करना चाहता है।
 

शिक्षा मनोविज्ञान : व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक


1. वंशानुक्रम का प्रभाव : व्यक्तित्व के विकास पर वंशानुक्रम का प्रभाव सर्वाधिक और अनिवार्यतः पड़ता है। स्किनर व हैरिमैन का मत है कि- “मनुष्य का व्यक्तित्व स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं है। उसे अपने माता-पिता से कुछ निश्चित शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और व्यावसायिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।”
2. सामाजिक वातावरण का प्रभाव : बालक जन्म के समय मानव-पशु होता है। उसमें सामाजिक वातावरण के सम्पर्क से परिवर्तन होता है। वह भाष, रहन-सहन का ढंग, खान-पान का तरीका, व्यवहार, धार्मिक व नैतिक विचार आदि समाज से प्राप्त करता है। समाज उसके व्यक्तित्व का निर्माण करता है। अतः बालकों को आदर्श नागरिक बनाने का उत्तरदायित्व समाज का होता है।
3. परिवार का प्रभाव : व्यक्तित्व के निर्माण का कार्य परिवार में आरम्भ होता है, जो समाज द्वारा पूरा किया जाता है। परिवार में प्रेम, सुरक्षा और स्वतंत्रता के वातावरण से बालक में साहस, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता आदि गुणों का विकास होता है। कठोर व्यवहार से वह कायर और असत्यभाषी बन जाता है।
4. सांस्कृतिक वातावरण का प्रभाव : समाज व्यक्ति का निर्माण करता है, तो संस्कृति उसके स्वरुप को निश्चित करती है। मनुष्य जिस संस्कृति में जन्म लेता है, उसी के अनुरूप उसका व्यक्तित्व होता है।
 
5. विद्यालय का प्रभाव : पाठ्यक्रम, अनुशासन , खेलकूद, शिक्षक का व्यवहार, सहपाठी आदि का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्तित्व के विकास पर पडता है। विद्यालय में प्रतिकूल वातावरण मिलने पर बालक कुंठित और विकृत हो जाता है।
6. संवेगात्मक विकास : अनुकूल वातावरण में रहकर बालक संवेगों पर नियंत्रण रखना सीखता है। संवेगात्मक असंतुलन की स्थिति में बालक का व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। इसलिए वांछित व्यक्तित्व के लिए संवेगात्मक स्थिरता को पहली प्राथमिकता दी जाती है।
 
7. मानसिक योग्यता  रूचि का प्रभाव : व्यक्ति की जिस क्षेत्र में रूचि होती है, वह उसी में सफलता पा सकता है और सफलता के अनुपात में ही व्यक्तित्व का विकास होता है। अधिक मानसिक योग्यता वाला बालक सहज ही अपने व्यवहारों को समाज के आदर्शों के अनुकूल बना देता है।
8. शारीरिक प्रभाव : अन्तः स्त्रावी ग्रंथियाँ, नलिका विहीन ग्रंथियाँ, शारीरिक रसायन, शारीरिक रचना आदि व्यक्तित्व को प्रभावित करते है। शारीर की दैहिक दशा, मस्तिष्क के कार्य पर प्रभाव डालने के कारण व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। इनके अलावा बालक की मित्र-मण्डली और पड़ोस भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करते है।
 

शिक्षा मनोविज्ञान : अतिमहत्त्वपूर्ण सुपर-40 प्रश्नोत्तरी


1. मनोविज्ञान के जनक माने जाते है?
विलियम जेम्स
2. मनोविज्ञान को व्यवहार का निश्चित विज्ञान किसने माना है?
वाटसन
3. मनोविज्ञान अध्ययन है-
व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन
4. साइकोलॉजी शब्द जिन दो शब्दों से मिलकर बना है, वह है-
-Psyche + Logos
5. शिक्षा को सर्वांगीण विकास का साधन माना है-
महात्मा गाँधी ने

6. मनोविज्ञान को मस्तिष्क का विज्ञान मानने वाले विद्वान कौन थे?
पॉम्पोनॉजी
7. मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान किसने माना?
वुन्ट, वाइव्स और जेम्स ने
8. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जनक कौन थे?
वुन्ट
9. वर्तमान में मनोविज्ञान को माना जाता है-
व्यवहार का विज्ञान
10. मनोविश्लेषणवाद के प्रवर्तक कौन थे?
फ्रायड

11. मानसिक परिक्षण की विधि विकसित करने वाले विद्वान कौन थे?
बिने
12. मनोविज्ञान का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान नही है-
शिक्षा के सैद्धान्तिक पक्ष पर बल
13. “आधुनिक मनोविज्ञान का सम्बंध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज से है।” यह परिभाषा किसकी है?
मन की
14. मनोविज्ञान के अंग्रेजी पर्याय ‘साइकोलॉजी’ शब्द की व्युत्पत्ति हुई-
ग्रीक भाषा से
15. शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री सम्बन्धित है-
सीखना

16. मनोविज्ञान को ‘विशुद्ध विज्ञान’ माना है-
जेम्स ड्रेवर ने
17. “मनोविज्ञान मन का वैज्ञानिक अध्ययन है।” कथन किसका है?
वेलेन्टाइन
18. मनोविज्ञान है-
विधायक विज्ञान
19. मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है-
मानव, जीवजन्तुओं तथा संसार के अन्य सभी प्राणियों काअध्ययन
20. व्यवहारवाद का जन्मदाता किसे माना जाता है?
वाटसन

21. शिक्षा में मनोवैज्ञानिक आंदोलन का सूत्रपात किसने किया?
रूसो ने
22. “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापको की तैयारी की आधारशिला है।” यह कथन किसका है?
स्किनर
23. कोलसनिक शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ किससे मानते है?
प्लेटो से
24. मूल-प्रवृत्तियाँ सम्पूर्ण मानव-व्यवहार की चालक है। किसने कहा?
मैक्डूगल
25. शिक्षा मनोविज्ञान ने स्पष्ट व निश्चित स्वरुप कब धारण किया?
अमरीकी मनोवैज्ञानिक थार्नडाइक, जुड, स्टेनले हाल, टरमन आदिके प्रयासों से शिक्षा मनोविज्ञान ने 1920 . में स्पष्ट  निश्चितस्वरुप धारण किया।

26. मनोविज्ञान का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है-
बालकेंद्रित, मूल्यांकन और पाठ्यक्रम 
27. शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन किया जाता है-
मूल प्रवृत्तियों, अनुशासन और अधिगम
28. शिक्षण का मुख्य केंद्र होता है?
बालक
29. “मनोविज्ञान, शिक्षक को अनेक धारणाएँ और सिद्धान्त प्रदान करके उसकी उन्नति में योग देता है।” यह किसने कहा?
कुप्पूस्वामी ने
30. शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति है-
वैज्ञानिक

31. शिक्षा में बालक का सम्बन्ध किससे होता है?
शिक्षक, विषयवस्तु और समाज से
32. शिक्षक मनोविज्ञान का उपयोग किसके लिए करता है?
स्वयं, बालक और अनुशासन के लिए
33. मूल्यांकन किसके लिए आवश्यक है?
छात्र और शिक्षक के लिए
34. शिक्षा मनोविज्ञान का अध्ययन अध्यापक को इसलिए करना चाहिए, ताकि-
इससे वह अपने शिक्षण को प्रभावी बना सकता है।
35. शिक्षा मनोविज्ञान आवश्यक है-
शिक्षक, छात्र और अभिभावक

36. अध्यापक वही सफल है जो-
बालको की रूचि को जानता हो
37. कक्षा से पलायन करने वाले बालको के प्रति आपका व्यवहार होगा-
निदानात्मक
38. “शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से वृद्धावस्था तक सीखने के अनुभवों का वर्णन एवं व्याख्या करती है।” यह कथन है-
क्रो  क्रो का
39. शिक्षा मनोविज्ञान एक शिक्षक के लिए मूल्यवान है। उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है-
उसे विद्यार्थी के बारे में ज्ञान मिलता है।
40. “मनोविज्ञान शिक्षा का आधारभूत विज्ञान है।” यह कथन है-
स्किनर
 

अधिगम का अर्थ :-


प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन नए-नए अनुभव एकत्रित करता है, इन नए अनुभवों से उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है। इस प्रकार नए अनुभव एकत्रित करना तथा इनसे व्यवहार में परिवर्तन आने की प्रक्रिया ही अधिगम है। अधिगम प्रक्रिया निरंतर चलने वाली ओर सार्वभौमिक प्रक्रिया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सिखना अनुभव द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।

अधिगम की परिभाषायें :-
1.  स्किनर के अनुसार, “अधिगम व्यवहार में उतरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”
2.  वुडवर्थ के अनुसार, “नवीन ज्ञान ओर नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम है।”
3.  क्रो एवं क्रो के अनुसार, “आदतों, ज्ञान ओर अभिवृतिओं का अर्जन ही अधिगम है।”
4.  गिलफोर्ड के अनुसार, “व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
5.  गेट्स व अन्य के अनुसार, “अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
6.  मार्गन एवं गिलीलैण्ड के अनुसार, “सीखना, अनुभव के परिणामस्वरूप प्राणी के व्यवहार में परिमार्जन है जो प्राणी द्वारा कुछ समय के लिए धारण किया जाता है।
 

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक :-


1.  पुर्व अधिगम
2.  विषय वस्तु का स्वरूप 
3.  विषय के प्रति मनोवृति 
4.  सीखने की इच्छा 
5.  सीखने की विधि 
6.  अभिप्रेरणा 
7.  वातावरण 
8.  थकान 
9.  शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य 
10.  वंशानुक्रम 

अधिगम के सिद्धांत


उपनाम :-
                         1.  उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धांत
                         2.  प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत
                         3.  संयोजनवाद का सिद्धांत
                         4.  अधिगम का बन्ध सिद्धांत
                         5.  प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत
                         6.  S-R थ्योरी
महत्वपूर्ण तथ्य :-
=>  यह सिद्धांत प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ‘एडवर्ड एल. थार्नडाइक’ द्वारा प्रतिपादित किया गया।
=>  यह सिद्धांत थार्नडाइक द्वारा सन 1913 ई. में दिया गया।
=>  थार्नडाइक ने अपनी पुस्तक “शिक्षा मनोविज्ञान” में इस सिद्धांत का वर्णन किया हैं।
=>  थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया।
=>  भूखी बिल्ली को जिस बॉक्स में बन्ध किया उस बॉक्स को “पज़ल बॉक्स”(Pazzle Box) कहते हैं।
=>  भोजन या उद्दीपक के रूप में थार्नडाइक ने “मछली” को रखा।

थार्नडाइक का प्रयोग


थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया। बिल्ली को कुछ समय तक भूखा रखने के बाद एक पिंजरे(बॉक्स) में बन्ध कर दिया। जिसे  “पज़ल बॉक्स”(Pazzle Box) कहते हैं। पिंजरे के बाहर भोजन के रूप में थार्नडाइक ने मछली का टुकड़ा रख दिया। पिंजरे के अन्दर एक लिवर(बटन) लगा हुआ था जिसे दबाने से पिंजरे का दरवाज़ा खुल जाता था। भूखी बिल्ली ने भोजन (मछली का टुकड़ा) को प्राप्त करने  व  पिंजरे से बाहर निकलने के लिए अनेक त्रुटिपूर्ण प्रयास किए। बिल्ली के लिए भोजन   उद्दीपक का  काम कर  रहा था ओर उद्दीपक के कारण बिल्ली प्रतिक्रिया कर रही थी।उसने अनेक प्रकार  से बाहर निकलने  का प्रयत्न  किया।एक बार संयोग से उसके पंजे से लिवर दब गया। लिवर दबने से पिंजरे  का दरवाज़ा खुल गया ओर भूखी बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकलकर भोजन को खाकर अपनी  भूख को शान्त किया। थार्नडाइक ने इस प्रयोग को बार- बार  दोहराया। तथा देखा कि प्रत्येक बार बिल्ली को बाहर  निकलने में पिछली बार से कम समय  लगा ओर  कुछ समय बाद बिल्ली बिना किसी भी प्रकार की भूल  के एक ही प्रयास में पिंजरे का दरवाज़ा  खोलना सीख गई। इस प्रकार उद्दीपक ओर अनुक्रिया में  सम्बन्ध स्थापित हो गया।

थार्नडाइक के नियम :-
मुख्य नियम :-
1.  तत्परता का नियम :- यह नियम कार्य करने से पूर्व तत्पर या तैयार किए जाने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर या तैयार होता है, तो उसे शीघ्र ही सीख लेता है। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित होती है। ध्यान केंद्रित करने मेँ भी तत्परता सहायता करती है।
2.  अभ्यास का नियम :- यह नियम किसी कार्य या सीखी गई विषय वस्तु के बार-बार अभ्यास करने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते है, तो उसे सरलतापूर्वक करना सीख जाते है। यदि हम सीखे हुए कार्य का अभ्यास नही करते है, तो उसको भूल जाते है।
3.  प्रभाव (परिणाम) का नियम :-इस नियम को सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख व सन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह बार-बार करना चाहता है और इसके विपरीत जिस कार्य को करने से दुःख या असन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह दोबारा नही करना चाहता है।

गौंण नियम :-
1.  बहु-प्रतिक्रिया का नियम :- इस नियम के अनुसार जब प्राणी के सामने कोई परिस्थिति या समस्या उत्पन्न हो जाती है तो उसका समाधान करने के लिए वह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं करता है,और इन प्रतिक्रियाएं को करने का क्रम तब तक जारी रहता है जब तक कि सही प्रतिक्रिया द्वारा समस्या का समाधान या हल प्राप्त नहीं हो जाता है। प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत इसी नियम पर आधारित हैं।
2.  मनोवृत्ति का नियम :- इस नियम को मानसिक विन्यास का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य के प्रति हमारी जैसी अभिवृति या मनोवृति होती है, उसी अनुपात में हम उसको सीखते हैं। यदि हम मानसिक रूप से किसी कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो या तो हम उसे करने में असफल होते हैं, या अनेक त्रुटियाँ करते हैं या बहुत विलम्ब से करते हैं।
3.  आंशिक क्रिया का नियम :- इस नियम के अनुसार किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में विभाजित करने से कार्य सरल और सुविधानक बन जाता है। इन भागों को शीघ्रता और सुगमता से करके सम्पूर्ण कार्य को पूरा किया जाता है। इस नियम पर ‘अंश से पूर्ण की ओर’ का शिक्षण का सिद्धांत आधारित किया जाता है।
4.  सादृश्यता अनुक्रिया का नियम :-  इस नियम को आत्मीकरण का नियम भी कहते है। यह नियम पूर्व अनुभव पर आधारित है। जब प्राणी के सामने कोई नवीन परिस्थिति या समस्या उत्पन्न होती है तो वह उससे मिलती-जुलती परिस्थिति या समस्या का स्मरण करता है, जिसका वह पूर्व में अनुभव कर चुका है। वह नवीन ज्ञान को अपने पर्व ज्ञान का स्थायी अंग बना लेते हैं।
5.  साहचर्य परिवर्तन का नियम :- इस नियम के अनुसार एक उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया बाद में किसी दूसरे उद्दीपक से भी होने लगती है। दूसरे शब्दों में, पहले कभी की गई क्रिया को उसी के समान दूसरी परिस्थिति  में उसी प्रकार से करना । इसमें क्रिया का स्वरूप तो वही रहता है, परन्तु परिस्थिति में परिवर्तन हो जाता है।थार्नडाइक ने पावलव के शास्त्रीय अनुबन्धन को ही साहचर्य परिवर्तन के नियम के रूप में व्यक्त किया।

बुद्धि का अर्थ


बुद्धि शब्द का प्रयोग प्राचीन काल से व्यक्ति की तत्परता, तात्कालिकता, समायोजन, तथा समस्या समाधान की क्षमताओं के रूप में किया जाता रहा है। बुद्धि क्या है ? इस सम्बंध में मनोवैज्ञानिकों  में  हमेशा मतभेद रहा है। इसीलिए अभी तक बुद्धि का कोई सर्वमान्य अर्थ प्रचलित नही हो पाया है।

बुद्धि की परिभाषायें        
1.  वुडवर्थ के अनुसार, “ बुद्धि, कार्य करने की एक विधि है।”
2.  बकिंघम के अनुसार, “ सीखने की शक्ति ही बुद्धि है।”
3.  टरमन के अनुसार, “ बुद्धि, अमूर्त विचारों के बारे में सोचने की योग्यता  है।”
4.  वुडरो के अनुसार, “ बुद्धि ज्ञान का अर्जन करने की क्षमता है।”
5.  बिने के अनुसार, “ बुद्धि इन चार शब्दों में निहित है – ज्ञान, आविष्कार, निर्देश और आलोचना।”
6.  स्टर्न के अनुसार, “ बुद्धि जीवन की नवीन समस्याओं के समायोजन की सामान्य योग्यता  है।”
7.  बर्ट के अनुसार, “ बुद्धि अच्छी तरह निर्णय करने, समझने तथा तर्क करने की योग्यता  है।”
8.  गाल्टन के अनुसार, “ बुद्धि पहचानने तथा सीखने की शक्ति है।”
9.  थार्नडाइक के अनुसार, “सत्य या तथ्य के दृष्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रियाओं की शक्ति ही बुद्धि है।”
 

बुद्धि के सिद्धांत


1एक खण्ड बुद्धि का सिद्धांत 
2दो खण्ड बुद्धि का सिद्धांत 
3तीन खण्ड बुद्धि का सिद्धांत 
4बहु खण्ड बुद्धि का सिद्धांत 
5समूह खण्ड बुद्धि का सिद्धांत 
6न्यादर्श या प्रतिदर्श बुद्धि का सिद्धांत 
7पदानुक्रमिक(क्रमिक महत्व) बुद्धि का सिद्धांत 
8त्रि-आयामी बुद्धि का सिद्धांत 
9बुद्धि ‘क’ और बुद्धि  ‘ख’का सिद्धांत 
10तरल-ठोस बुद्धि का सिद्धांत 
 

अभिप्रेरणा का अर्थ :-


अभिप्रेरणा शब्द का अंग्रेजी समानार्थक शब्द‘Motivation'(मोटिवेशन) जो की लेटिन भाषा के ‘Motum'(मोटम) या ‘Moveers'(मोवेयर) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘To Move’ अर्थात गति प्रदान करना। इस प्रकार अभिप्रेरणा वह कारक है, जो कार्य को गति प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में अभिप्रेरणा एक आंतरिक शक्ति है, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इसी लिए अभिप्रेरणा ध्यानाकर्षण या लालच की कला है, जो व्यक्ति में किसी कार्य को करने की ईच्छा एवं जिज्ञासा उत्पन्न करती है।
 
शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है तथा प्रत्येक क्रिया के पीछे एक बल कार्य करता है जिसे हम प्रेरक बल कहते है। इस संदर्भ में प्रेरणा एक बल है जो प्राणी को कोई निश्चित व्यवहार या निश्चित दिशा में चलने के लिये बाध्य करती है।
 

अभिप्रेरणा की परिभाषायें :-


1.  स्किनर के अनुसार, “अभिप्रेरणा सिखने का सर्वोत्तम राजमार्ग  है।”
2.  गुड  के अनुसार, “अभिप्रेरणा कार्य को आरम्भ करने , जारी रखने की प्रक्रिया है।”
3.  मैक्डूगल के अनुसार, “अभिप्रेरणा वे शारीरिक ओर मनोवैज्ञानिक दशाएं है, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है।”
4.  वुडवर्थ के अनुसार, “अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है, जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।”
5.  गेट्स व अन्य के अनुसार, “अभिप्रेरणा प्राणी  के भीतर शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दशा है, जो उसे विशेष प्रकार की क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है।”
 

प्रतिपादक


=>मनोविज्ञान के जनक = विलियम जेम्स
=>आधुनिक मनोविज्ञान के जनक=विलियम जेम्स
=>प्रकार्यवाद साम्प्रदाय के जनक=विलियम जेम्स
=>आत्म सम्प्रत्यय की अवधारणा= विलियम जेम्स
=>शिक्षा मनोविज्ञान के जनक=थार्नडाइक
=>प्रयास एवं त्रुटिसिद्धांत= थार्नडाइक
=>प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत = थार्नडाइक
=>संयोजनवाद का सिद्धांत = थार्नडाइक
=>उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धांत = थार्नडाइक
=>S-R थ्योरी के जन्मदाता= थार्नडाइक
=>अधिगम का बन्ध सिद्धांत = थार्नडाइक
=>संबंधवाद का सिद्धांत= थार्नडाइक
=>प्रशिक्षण अंतरण का सर्वसम अवयव का सिद्धांत = थार्नडाइक
=>बहु खंड बुद्धि का सिद्धांत= थार्नडाइक
=> बिने-साइमन बुद्धि परीक्षण के प्रतिपादक = बिने एवं साइमन
=>बुद्धि परीक्षणों के जन्मदाता =बिने
=>एक खंड बुद्धि का सिद्धांत =बिने
=>दो खंड बुद्धि का सिद्धांत =स्पीयरमैन
=>तीन खंड बुद्धि का सिद्धांत=स्पीयरमैन
=>सामान्य व विशिष्ट तत्वों के सिद्धांत के प्रतिपादक = स्पीयरमैन
=>बुद्धिका द्वय शक्ति का सिद्धांत = स्पीयरमैन
=>त्रि-आयामबुद्धि का सिद्धांत= गिलफोर्ड
=>बुद्धि संरचना का सिद्धांत=गिलफोर्ड
=>समूह खंड बुद्धि का सिद्धांत =थर्स्टन
=>युग्म तुलनात्मक निर्णय विधि के प्रतिपादक= थर्स्टन
=>क्रमबद्ध अंतराल विधि के प्रतिपादक= थर्स्टन
=>समदृष्टि अन्तर विधि के प्रतिपादक = थर्स्टन व चेव
=>न्यादर्श या प्रतिदर्श(वर्ग घटक) बुद्धि का सिद्धांत= थॉमसन
=>पदानुक्रमिक(क्रमिक महत्व) बुद्धि का सिद्धांत=बर्ट एवं वर्नन
=>तरल-ठोस बुद्धि का सिद्धांत = आर. बी. केटल
=>प्रतिकारक (विशेषक) सिद्धांत के प्रतिपादक =आर. बी. केटल
=>बुद्धि ‘क’ और बुद्धि’ख’ का सिद्धांत = हैब
=>बुद्धि इकाई का सिद्धांत= स्टर्न एवं जॉनसन
=>बुद्धि लब्धि ज्ञात करने के सुत्र के प्रतिपादक = विलियम स्टर्न
=>संरचनावाद साम्प्रदाय के जनक = विलियम वुण्ट
=>प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जनक = विलियम वुण्ट
=>विकासात्मक मनोविज्ञान के प्रतिपादक= जीन पियाजे
=>संज्ञानात्मक विकास कासिद्धांत= जीन पियाजे
=>मूलप्रवृत्तियोंके सिद्धांत के जन्मदाता = विलियम मैक्डूगल
=>हार्मिक का सिध्दान्त= विलियम मैक्डूगल
=>मनोविज्ञान को मन मस्तिष्क का विज्ञान=पोंपोलॉजी
=>क्रिया प्रसूत अनुबंधन का सिध्दान्त = स्किनर
=>सक्रिय अनुबंधन का सिध्दान्त= स्किनर
=>अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत = इवान पेट्रोविच पावलव
=>संबंध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत= इवान पेट्रोविच पावलव
=>शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत=इवान पेट्रोविच पावलव
=>प्रतिस्थापक का सिद्धांत = इवान पेट्रोविच पावलव
=>प्रबलन(पुनर्बलन)का सिद्धांत= सी. एल. हल
=>व्यवस्थित व्यवहार का सिद्धांत = सी. एल. हल
=>सबलीकरण का सिद्धांत= सी. एल. हल
=>संपोषक का सिद्धांत= सी. एल. हल
=>चालक / अंतर्नोद(प्रणोद) का सिद्धांत= सी. एल. हल
=>अधिगम का सूक्ष्म सिद्धान्त= कोहलर
=>सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धांत = कोहलर, वर्दीमर, कोफ्का
=>गेस्टाल्टवाद सम्प्रदाय के जनक= कोहलर, वर्दीमर, कोफ्का
=>क्षेत्रीय सिद्धांत= लेविन
=>तलरूप का सिद्धांत= लेविन
=>समूह गतिशीलता सम्प्रत्यय के प्रतिपादक = लेविन
=>सामीप्य संबंधवाद का सिद्धांत= गुथरी
=>साईन(चिह्न) का सिद्धांत = टॉलमैन
=>सम्भावना सिद्धांत के प्रतिपादक= टॉलमैन
=>अग्रिम संगठक प्रतिमान के प्रतिपादक= डेविड आसुबेल
=>भाषायी सापेक्षता प्राक्कल्पना के प्रतिपादक = व्हार्फ
=>मनोविज्ञान के व्यवहारवादीसम्प्रदाय के जनक= जोहन बी. वाटसन
=>अधिगम या व्यव्हार सिद्धांत के प्रतिपादक = क्लार्क
=>सामाजिक अधिगमसिद्धांत के प्रतिपादक= अल्बर्ट बाण्डूरा
=>पुनरावृत्ति का सिद्धांत= स्टेनले हॉल
=>अधिगम सोपानकी के प्रतिपादक= गेने

=>विकास के सामाजिक प्रवर्तक= एरिक्सन
=>प्रोजेक्ट प्रणाली से करके सीखना का सिद्धांत= जान ड्यूवी
=>अधिगम मनोविज्ञानका जनक= एविग हास
=>अधिगम अवस्थाओं के प्रतिपादक = जेरोम ब्रूनर
=>संरचनात्मक अधिगम का सिद्धांत = जेरोम ब्रूनर
=>सामान्यीकरण का सिद्धांत= सी. एच. जड
=>शक्तिमनोविज्ञान का जनक = वॉल्फ
=>अधिगम अंतरण का मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धांत= बगले
=>भाषा विकास का सिद्धांत= चोमस्की
=>माँग-पूर्ति(आवश्यकता पदानुक्रम) का सिद्धांत= मैस्लो (मास्लो)
=>स्व-यथार्थीकरण अभिप्रेरणा का सिद्धांत = मैस्लो (मास्लो)
=>आत्मज्ञान का सिद्धांत = मैस्लो (मास्लो)
=>उपलब्धि अभिप्रेरणा का सिद्धांत= डेविड सी.मेक्लिएंड
=>प्रोत्साहन का सिद्धांत= बोल्स व काफमैन
=>शील गुण(विशेषक) सिद्धांत के प्रतिपादक= आलपोर्ट
=>व्यक्तित्व मापन का माँग का सिद्धांत= हेनरी मुरे
=>कथानक बोध परीक्षणविधि के प्रतिपादक= मोर्गन व मुरे
=>प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण (T.A.T.) विधि के प्रतिपादक=मोर्गन व मुरे
=>बाल -अन्तर्बोध परीक्षण (C.A.T.) विधि के प्रतिपादक = लियोपोल्ड बैलक
=>रोर्शा स्याही ध्ब्बा परीक्षण (I.B.T.) विधि के प्रतिपादक=हरमन रोर्शा
=>वाक्य पूर्तिपरीक्षण (S.C.T.)विधि के प्रतिपादक= पाईन व टेंडलर
=>व्यवहार परीक्षण विधि के प्रतिपादक = मे एवं हार्टशार्न
=>किंडरगार्टन(बालोद्यान ) विधि केप्रतिपादक= फ्रोबेल
=>खेल प्रणाली के जन्मदाता = फ्रोबेल
=>मनोविश्लेषण विधि के जन्मदाता = सिगमंड फ्रायड
=>स्वप्न विश्लेषणविधि केप्रतिपादक = सिगमंड फ्रायड
=>प्रोजेक्टविधि केप्रतिपादक= विलियम हेनरी क्लिपेट्रिक
=>मापनी भेदक विधि केप्रतिपादक = एडवर्ड्स व क्लिपेट्रिक
=>डाल्टन विधि की प्रतिपादक= मिस हेलेन पार्कहर्स्ट
=>मांटेसरीविधि की प्रतिपादक = मेडम मारिया मांटेसरी
=>डेक्रोलीविधि केप्रतिपादक= ओविड डेक्रोली
=>विनेटिका(इकाई) विधि केप्रतिपादक= कार्लटन वाशबर्न
=>ह्यूरिस्टिकविधि केप्रतिपादक = एच. ई.आर्मस्ट्रांग
=>समाजमिति विधि केप्रतिपादक = जे. एल. मोरेनो
=>योग निर्धारण विधि के प्रतिपादक= लिकर्ट
=>स्केलोग्राम विधि के प्रतिपादक= गटमैन
=>विभेद शाब्दिक विधि के प्रतिपादक = आसगुड
=>स्वतंत्र शब्द साहचर्य परीक्षण विधि केप्रतिपादक = फ़्रांसिस गाल्टन
=>स्टेनफोर्ड- बिने स्केल परीक्षण केप्रतिपादक= टरमन
=>पोरटियस भूल-भुलैया परीक्षण केप्रतिपादक= एस.डी. पोरटियस
=>वेश्लर-वेल्यूब बुद्धि परीक्षण के प्रतिपादक= डी.वेश्लवर
=>आर्मी अल्फा परीक्षण के प्रतिपादक= आर्थर एस. ओटिस
=>आर्मी बिटा परीक्षण के प्रतिपादक = आर्थर एस. ओटिस
=>हिन्दुस्तानी बिने क्रिया परीक्षण के प्रतिपादक = सी.एच.राइस
=>प्राथमिक वर्गीकरण परीक्षण के प्रतिपादक= जे. मनरो
=>बाल अपराध विज्ञान का जनक = सीजर लोम्ब्रसो
=>वंश सुत्र के नियम के प्रतिपादक= मैंडल
=>ब्रेल लिपि के प्रतिपादक= लुई ब्रेल
=>साहचर्य सिद्धांत के प्रतिपादक = एलेक्जेंडर बैन
=>”सीखने के लिए सीखना” सिद्धांत के प्रतिपादक = हर्लो
=>शरीर रचना का सिद्धांत= शैल्डन
=>व्यक्तित्व मापन के जीव सिद्धांत के प्रतिपादक= गोल्डस्टीन
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Anjali Yadav

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